
देश में चुनाव प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने विपक्षी दलों के चुनाव बहिष्कार के विचार का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि अगर विपक्ष चुनाव मैदान से हट जाता है तो इससे सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए सभी सीटों पर मुकाबला करने का रास्ता खुल सकता है। उनके मुताबिक, विपक्ष को चुनाव प्रक्रिया में बने रहते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की मांग भी लगातार उठानी चाहिए।
डेरेक ओ’ब्रायन का यह बयान Cockroach Janta Party (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके की उस अपील के बाद आया, जिसमें उन्होंने विपक्षी दलों से कथित तौर पर धांधली वाले चुनावों में हिस्सा नहीं लेने की बात कही थी। दीपके का तर्क है कि यदि किसी राजनीतिक दल को लगता है कि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं है, तो उसके बावजूद चुनाव लड़ना ऐसी प्रक्रिया को वैधता देने जैसा हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच चुनाव में हिस्सा लेने या बहिष्कार करने को लेकर विपक्षी राजनीति में एक अलग बहस सामने आई है। एक तरफ चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ चुनावी मैदान छोड़ने के संभावित राजनीतिक और संवैधानिक प्रभावों को लेकर भी चर्चा हो रही है।
डेरेक ओ’ब्रायन ने चुनाव बहिष्कार के खिलाफ क्या कहा?
TMC के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं में शामिल डेरेक ओ’ब्रायन ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए चुनाव बहिष्कार के विचार पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि यदि विपक्ष चुनाव नहीं लड़ता है और चुनावी मैदान पूरी तरह BJP के लिए खुल जाता है, तो इससे देश की राजनीतिक व्यवस्था पर दूरगामी असर पड़ सकता है।
उन्होंने अपने पोस्ट में विपक्ष के चुनाव बहिष्कार की स्थिति को लेकर कहा कि अगर विपक्ष चुनाव नहीं लड़ेगा तो BJP सभी सीटें जीत सकती है और उसके बाद संविधान में बदलाव करने की स्थिति पैदा हो सकती है। यह डेरेक ओ’ब्रायन का राजनीतिक तर्क है, जिसे उन्होंने विपक्ष के चुनाव लड़ने के पक्ष में रखते हुए सामने रखा।
ओ’ब्रायन ने यह भी कहा कि चुनाव नहीं लड़ने का असर केवल राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व पर नहीं पड़ेगा, बल्कि उन लाखों कार्यकर्ताओं पर भी पड़ेगा जो चुनावी मैदान में पार्टी के लिए काम करते हैं। उनके मुताबिक, जमीन पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं को चुनाव से बाहर रहने का फैसला निराश कर सकता है।
‘चुनाव भी लड़ें और निष्पक्ष चुनाव की लड़ाई भी जारी रखें’
डेरेक ओ’ब्रायन ने अपने बयान में विपक्षी दलों के लिए एक साथ दो मोर्चों पर काम करने की बात कही। उनके अनुसार, राजनीतिक दलों को चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेना चाहिए और साथ ही फ्री एंड फेयर इलेक्शन यानी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की मांग को भी मजबूती से उठाना चाहिए।
इस तरह उनका तर्क चुनाव बहिष्कार की बजाय चुनावी प्रक्रिया के भीतर रहकर उसमें सुधार और पारदर्शिता की मांग करने पर केंद्रित है। उन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए चुनाव लड़ना जरूरी बताया।
यह बयान ऐसे समय आया है जब निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची और Special Intensive Revision (SIR) को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। CJP ने इन मुद्दों को लेकर निर्वाचन आयोग के खिलाफ अभियान शुरू करने की घोषणा की है।
अभिजीत दीपके ने क्यों उठाई चुनाव बहिष्कार की मांग?
CJP के संस्थापक और राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके ने विपक्षी दलों से कहा था कि अगर उन्हें लगता है कि चुनाव में धांधली हो रही है तो उन्हें चुनाव में हिस्सा लेने के बजाय उसका बहिष्कार करना चाहिए।
दीपके का तर्क है कि किसी चुनावी प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल उठाने के बावजूद उसी प्रक्रिया में भाग लेना विरोधाभासी स्थिति पैदा करता है। उन्होंने इसी संदर्भ में कहा था कि अगर विपक्ष को लगता है कि ‘गेम फिक्स’ है तो वह उसी गेम का हिस्सा क्यों बना हुआ है।
उनका यह बयान चुनावी प्रक्रिया को लेकर उनकी व्यापक आपत्तियों के बीच आया है। CJP ने निर्वाचन आयोग और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों को लेकर कई मांगें रखी हैं और चुनावी सुधार को लेकर आंदोलन की घोषणा भी की है।
CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग
अभिजीत दीपके ने 24 सितंबर को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। CJP ने उन्हें इस्तीफा देने के लिए 48 घंटे की समयसीमा दी और कहा कि ऐसा नहीं होने पर देशव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा।
पार्टी ने इस संभावित आंदोलन को ‘Jantar Mantar 2.0’ नाम दिया है। इसके साथ ही CJP ने ‘Election Commission Thik Karo’ अभियान शुरू करने की घोषणा की। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पार्टी ने SIR और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
भारत निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, ज्ञानेश कुमार वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त हैं और उन्होंने 19 फरवरी 2025 को 26वें CEC के रूप में पदभार संभाला था।
CJP के आरोपों पर क्या है चुनाव आयोग का पक्ष?
मतदाता सूची और निर्वाचन आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर सामने आए विवाद में CJP ने गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि इन आरोपों को स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाली तथा चुनावी रोल से जुड़े सिस्टम के संचालन जैसे मुद्दों पर कई बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इस घटनाक्रम को लेकर निर्वाचन आयोग ने हालांकि इसे तीन सदस्यीय आयोग के भीतर किसी विभाजन के रूप में पेश किए जाने से इनकार किया है।
एक बयान में आयोग ने कहा कि आंतरिक विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय, लिखित टिप्पणियां और प्रक्रियागत जांच सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग ने यह भी कहा कि उसके निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
इसलिए चुनाव प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी या मतदाता सूची में बदलाव को लेकर विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों तथा निर्वाचन आयोग के आधिकारिक पक्ष को अलग-अलग समझना जरूरी है।
‘चुनाव नहीं लड़ना कार्यकर्ताओं के साथ विश्वासघात’
डेरेक ओ’ब्रायन ने अपने बयान में विपक्षी दलों के जमीनी कार्यकर्ताओं का भी उल्लेख किया। उनका कहना है कि चुनाव सिर्फ राजनीतिक नेताओं के बीच मुकाबला नहीं होता, बल्कि हजारों और लाखों कार्यकर्ता इसके लिए लंबे समय तक काम करते हैं।
उनके अनुसार, चुनाव का बहिष्कार करने का फैसला उन कार्यकर्ताओं के प्रयासों को प्रभावित करेगा जो पार्टी के लिए जमीन पर प्रचार, संगठन और जनसंपर्क का काम करते हैं। इसलिए विपक्षी दलों को चुनावी प्रक्रिया से पूरी तरह अलग होने के बजाय उसमें शामिल रहकर अपने अधिकारों और निष्पक्ष चुनाव की मांग को आगे बढ़ाना चाहिए।
यहां दोनों पक्षों के तर्कों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। दीपके चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए जाने की स्थिति में बहिष्कार को दबाव बनाने के साधन के रूप में देखते हैं, जबकि ओ’ब्रायन चुनाव लड़ते हुए उसी समय चुनाव सुधार और पारदर्शिता की मांग जारी रखने की बात कर रहे हैं।
चुनाव बहिष्कार बनाम चुनावी प्रक्रिया में बने रहने की बहस
इस घटनाक्रम ने विपक्षी राजनीति के सामने एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सवाल खड़ा किया है। यदि कोई राजनीतिक दल चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाता है, तो उसके पास चुनाव में हिस्सा लेकर व्यवस्था के भीतर अपनी बात रखने और चुनाव से दूरी बनाकर विरोध दर्ज कराने जैसे अलग-अलग रास्ते हो सकते हैं।
डेरेक ओ’ब्रायन का बयान चुनाव में भागीदारी के पक्ष में है। दूसरी ओर अभिजीत दीपके का तर्क है कि अगर किसी दल को चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा नहीं है तो उसे उसमें भाग लेकर उसे वैधता नहीं देनी चाहिए।
हालांकि इस बहस का अंतिम राजनीतिक रुख अलग-अलग विपक्षी दलों की रणनीति पर निर्भर करेगा। अभी उपलब्ध रिपोर्टों में ऐसा कोई व्यापक निर्णय सामने नहीं आया है कि सभी विपक्षी दल चुनाव बहिष्कार करने जा रहे हैं।
क्या है पूरा विवाद?
पूरे घटनाक्रम को समझें तो विवाद के तीन प्रमुख हिस्से सामने आते हैं। पहला, मतदाता सूची और SIR को लेकर उठ रहे सवाल हैं। दूसरा, CJP की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और संभावित आंदोलन है। तीसरा, चुनाव में हिस्सा लेने या बहिष्कार करने को लेकर विपक्ष के भीतर सामने आया अलग-अलग दृष्टिकोण है।
CJP ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के साथ-साथ SIR से जुड़ी प्रक्रिया पर रोक और मतदाता सूची से संबंधित अन्य मांगें भी उठाई हैं। पार्टी ने कहा है कि अगर 48 घंटे की समयसीमा में उनकी मांग पूरी नहीं होती है तो आंदोलन को आगे बढ़ाया जाएगा।
वहीं डेरेक ओ’ब्रायन का रुख यह है कि विपक्ष को चुनावी प्रक्रिया से बाहर नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, चुनाव लड़ना और साथ-साथ स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के लिए संघर्ष करना दोनों काम एक साथ किए जा सकते हैं।
निष्कर्ष
चुनाव बहिष्कार को लेकर डेरेक ओ’ब्रायन और अभिजीत दीपके के बयान ने चुनाव प्रक्रिया और विपक्ष की रणनीति को लेकर चल रही बहस को और चर्चा में ला दिया है। जहां दीपके चुनाव प्रक्रिया पर उठाए जा रहे सवालों के बीच चुनाव बहिष्कार की बात कर रहे हैं, वहीं ओ’ब्रायन का कहना है कि विपक्ष को चुनाव मैदान में बने रहते हुए पारदर्शी और निष्पक्ष चुनाव की मांग करनी चाहिए।
फिलहाल CJP की ओर से CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और ‘Jantar Mantar 2.0’ आंदोलन की चेतावनी सामने है। दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग ने आंतरिक मतभेदों को लेकर सामने आई रिपोर्टों को संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा बताया है। ऐसे में आने वाले दिनों में चुनावी सुधार, मतदाता सूची और विपक्ष की चुनावी रणनीति से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक बहस और तेज हो सकती है।



