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मोदी सरकार के डेटा प्रोटेक्शन कानून को कोर्ट में चुनौती, पत्रकारों की गोपनीयता और प्रेस की आजादी पर उठे सवाल

भारत में डिजिटल डेटा की सुरक्षा को लेकर बनाए गए नए कानून पर मीडिया जगत में बहस तेज हो गई है। देश के कई प्रमुख समाचार प्रकाशकों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून को अदालत में चुनौती दी है। मीडिया संस्थानों का कहना है कि इस कानून के कुछ प्रावधान खोजी पत्रकारिता, खबरों के स्रोतों की गोपनीयता और जनहित से जुड़ी रिपोर्टिंग को प्रभावित कर सकते हैं।

इस मामले में मुकेश अंबानी और गौतम अडानी से जुड़े मीडिया संस्थानों सहित कई समाचार प्रकाशकों की ओर से आपत्तियां उठाई गई हैं। मीडिया कंपनियों का तर्क है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने के कारण पत्रकारों को किसी व्यक्ति के डिजिटल डेटा का इस्तेमाल करने से पहले उसकी जानकारी देनी पड़ सकती है और कुछ परिस्थितियों में सहमति भी लेनी पड़ सकती है।

प्रकाशकों को आशंका है कि इससे भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं और सार्वजनिक हित से जुड़े अन्य मामलों की जांच प्रभावित हो सकती है। वहीं, केंद्र सरकार का कहना है कि वह प्रेस की स्वतंत्रता का सम्मान करती है। ऐसे में यह विवाद व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता के अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़ा अहम मुद्दा बन गया है।

क्या है डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून?

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट यानी DPDP Act का उद्देश्य लोगों के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा करना और यह तय करना है कि कंपनियां तथा अन्य संस्थाएं इस डेटा को किस तरह एकत्र कर सकती हैं, इस्तेमाल कर सकती हैं और सुरक्षित रख सकती हैं।

आज इंटरनेट, सोशल मीडिया, मोबाइल ऐप और डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ लोगों की निजी जानकारी बड़ी मात्रा में ऑनलाइन उपलब्ध होती है। इसमें नाम, संपर्क विवरण और अन्य ऐसी जानकारियां शामिल हो सकती हैं, जिनसे किसी व्यक्ति की पहचान की जा सकती है। इस कानून के तहत ऐसे डेटा के इस्तेमाल और उसकी सुरक्षा से जुड़े नियम निर्धारित किए गए हैं।

हालांकि, मीडिया संगठनों की चिंता यह है कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियमों का प्रभाव पत्रकारिता पर भी पड़ सकता है। उनका कहना है कि खोजी पत्रकारिता में कई बार ऐसे दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच करनी पड़ती है, जो किसी व्यक्ति, कंपनी या सार्वजनिक संस्था से जुड़े गंभीर सवालों के जवाब दे सकते हैं।

प्रकाशकों के अनुसार, यदि पत्रकारों को हर मामले में संबंधित व्यक्ति को पहले से सूचना देनी पड़े या उसकी सहमति पर निर्भर रहना पड़े, तो कई महत्वपूर्ण खबरों की जांच और प्रकाशन मुश्किल हो सकता है।

1. जांच के दौरान संबंधित व्यक्ति से सहमति लेने का सवाल

मीडिया प्रकाशकों की प्रमुख आपत्ति कानून के उस प्रावधान को लेकर है, जिसके तहत व्यक्तिगत डिजिटल डेटा का इस्तेमाल करने वाली संस्थाओं पर संबंधित व्यक्ति को सूचना देने और आवश्यक सहमति प्राप्त करने की जिम्मेदारी हो सकती है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर यह प्रक्रिया आम तौर पर तब दिखाई देती है, जब कोई उपयोगकर्ता किसी सेवा के लिए साइन अप करता है और अपनी जानकारी के इस्तेमाल से संबंधित शर्तें स्वीकार करता है। लेकिन पत्रकारिता में स्थिति अलग हो सकती है, खासकर तब जब किसी मामले की गोपनीय जांच की जा रही हो।

डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) का तर्क है कि यदि पत्रकार को जांच के विषय बने व्यक्ति को पहले ही सूचित करना पड़े, तो संबंधित व्यक्ति सबूत नष्ट कर सकता है, गवाहों पर दबाव डाल सकता है या खबर के प्रकाशन में बाधा उत्पन्न कर सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई पत्रकार किसी कंपनी में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच कर रहा है और उसे संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल करनी है, तो जांच की जानकारी पहले ही सामने आने से सबूतों तक पहुंच प्रभावित हो सकती है। इसी तरह, किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ आरोपों की पड़ताल में भी गोपनीयता महत्वपूर्ण हो सकती है।

प्रकाशकों का कहना है कि कानून में शोध, अभिलेखों के संरक्षण और सांख्यिकीय उद्देश्यों के लिए कुछ छूट दी गई है, लेकिन पत्रकारिता को स्पष्ट रूप से छूट नहीं मिली है। इसी वजह से वे इसे प्रेस की स्वतंत्रता के लिहाज से महत्वपूर्ण मुद्दा मान रहे हैं।

2. क्या कानून के कारण प्रकाशित खबरें हटाने का दबाव बन सकता है?

मीडिया संगठनों की दूसरी बड़ी चिंता प्रकाशित खबरों और पुराने रिकॉर्ड को लेकर है। कानून के तहत व्यक्ति को कुछ परिस्थितियों में अपनी सहमति वापस लेने का अधिकार दिया गया है। ऐसी स्थिति में डेटा संभालने वाली संस्था को उचित समय के भीतर संबंधित व्यक्तिगत डेटा का इस्तेमाल बंद करना और उसे मिटाना पड़ सकता है, जब तक कि किसी दूसरे कानून के तहत उसे सुरक्षित रखना जरूरी न हो।

समाचार प्रकाशकों का कहना है कि यदि इन प्रावधानों को पत्रकारिता पर भी लागू किया जाता है, तो खोजी रिपोर्टों में शामिल व्यक्ति इसका इस्तेमाल खबर हटवाने या उसमें बदलाव करवाने के लिए कर सकते हैं।

DNPA की आशंका है कि कोई व्यक्ति अपनी निजी जानकारी की सुरक्षा के वास्तविक उद्देश्य के बजाय इस प्रावधान का इस्तेमाल किसी असहज खबर को हटवाने के लिए कर सकता है। इससे जनहित से जुड़ी रिपोर्टों को हटाने या उनमें महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने का दबाव बन सकता है।

इसका एक दूसरा पहलू ऐतिहासिक रिकॉर्ड से भी जुड़ा है। समाचार संस्थान किसी घटना, विवाद या जांच से संबंधित जानकारी को प्रकाशित करने के बाद उसे सार्वजनिक रिकॉर्ड के रूप में सुरक्षित रखते हैं। यदि बाद में किसी खबर को हटाना या बड़े पैमाने पर संपादित करना पड़े, तो उस घटना का डिजिटल रिकॉर्ड अधूरा हो सकता है।

हालांकि, किसी व्यक्ति की वास्तविक निजता की रक्षा करना भी महत्वपूर्ण है। विवाद का मुख्य प्रश्न यह है कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और जनहित में प्रकाशित सत्यापित समाचारों के संरक्षण के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाए।

3. सरकारी सूचना मांगने की शक्ति से पत्रकारों के स्रोतों पर खतरा?

इस कानून का एक अन्य प्रावधान सरकार को व्यक्तिगत डेटा संभालने वाली संस्थाओं से आवश्यक जानकारी मांगने की शक्ति देता है। मीडिया प्रकाशकों का कहना है कि यदि समाचार संस्थानों को इस प्रावधान से स्पष्ट छूट नहीं मिलती, तो यह अधिकार न्यूजरूम और पत्रकारों के पास मौजूद जानकारी पर भी लागू हो सकता है।

प्रकाशकों ने अदालत में दायर अपनी याचिका में इस शक्ति को लेकर चिंता जताई है। उनका तर्क है कि यदि जानकारी मांगने के लिए न्यायिक मंजूरी जैसी पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं है, तो इसका इस्तेमाल पत्रकारों के गोपनीय स्रोतों की पहचान करने के लिए किया जा सकता है।

खोजी पत्रकारिता में कई बार सूत्र ऐसी जानकारी उपलब्ध कराते हैं, जो सार्वजनिक हित के लिए महत्वपूर्ण होती है। भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अनियमितताओं या किसी संस्था में कथित गड़बड़ी से जुड़ी खबरों में इन स्रोतों की पहचान उजागर होने का जोखिम रहता है।

यदि किसी पत्रकार को जानकारी देने वाले व्यक्ति की पहचान सामने आ जाती है, तो उसे पेशेवर या व्यक्तिगत नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। भविष्य में अन्य लोग भी संवेदनशील मामलों की जानकारी साझा करने से हिचक सकते हैं।

मीडिया संगठनों ने यह भी आशंका जताई है कि सरकारी सूचना मांगने की शक्ति का दायरा पत्रकारों के पास मौजूद गोपनीय संवाद और स्रोतों से जुड़ी जानकारी तक पहुंच सकता है।

कानून के प्रावधानों के अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचने की आशंका होने पर किसी संस्था को संबंधित व्यक्ति को जानकारी साझा किए जाने की सूचना देने से रोका भी जा सकता है। प्रकाशकों का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में पर्याप्त सुरक्षा उपाय और स्पष्ट सीमाएं जरूरी हैं, ताकि वैध सरकारी जरूरतों के नाम पर पत्रकारिता के स्रोतों की गोपनीयता प्रभावित न हो।

4. मीडिया संस्थानों पर 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना

DPDP कानून के तहत नियमों का पालन नहीं करने वाली संस्थाओं पर भारी आर्थिक दंड लगाने का प्रावधान भी है। कानून के तहत डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड कुछ उल्लंघनों के मामलों में अधिकतम 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगा सकता है।

समाचार प्रकाशकों का कहना है कि इतनी बड़ी राशि का जुर्माना सभी मीडिया संस्थानों के लिए समान रूप से वहन करना संभव नहीं है। खासकर छोटे, क्षेत्रीय, स्वतंत्र और डिजिटल माध्यमों से संचालित समाचार संस्थानों के लिए यह आर्थिक रूप से गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है।

बड़े मीडिया समूहों के पास जहां कानूनी और वित्तीय संसाधन अपेक्षाकृत अधिक हो सकते हैं, वहीं छोटे प्रकाशकों के लिए भारी जुर्माना उनके कारोबार को प्रभावित कर सकता है। DNPA के अनुसार, यदि किसी उल्लंघन की प्रकृति और उसके प्रभाव के अनुपात में दंड तय नहीं किया गया, तो इससे मीडिया संस्थानों के कामकाज पर व्यापक असर पड़ सकता है।

प्रकाशकों की चिंता केवल जुर्माने तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि आर्थिक दंड का खतरा समाचार संस्थानों को संवेदनशील विषयों पर रिपोर्टिंग करते समय अतिरिक्त दबाव में डाल सकता है।

हालांकि, कानून के तहत निर्धारित जुर्माने का उद्देश्य डेटा सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन सुनिश्चित करना है। इस विवाद में यह सवाल अहम है कि नियमों के उल्लंघन की गंभीरता और मीडिया संस्थानों की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दंड किस प्रकार लागू किया जाएगा।

5. खबरों और डिजिटल कंटेंट को ब्लॉक करने का प्रावधान भी विवाद में

मीडिया प्रकाशकों ने कानून के तहत सामग्री को ब्लॉक करने की संभावित शक्ति पर भी सवाल उठाए हैं। संबंधित प्रावधानों के अनुसार, यदि डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड किसी संस्था पर कम से कम दो बार जुर्माना लगाने के बाद सामग्री ब्लॉक करने की सिफारिश करता है, तो सरकार जनहित में उस संस्था की सामग्री को ब्लॉक करने का आदेश दे सकती है।

प्रकाशकों का तर्क है कि इस शक्ति के दायरे और इस्तेमाल की सीमाओं को स्पष्ट किया जाना चाहिए। उनकी चिंता है कि यदि किसी समाचार संस्थान की सामग्री को व्यापक रूप से ब्लॉक करने का फैसला लिया जाता है, तो इसका असर केवल संबंधित खबर पर नहीं, बल्कि उसकी अन्य प्रकाशित सामग्री और पाठकों तक पहुंच पर भी पड़ सकता है।

मीडिया संगठनों ने अदालत में दलील दी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने के लिए स्पष्ट आधार और पर्याप्त सुरक्षा उपाय होने चाहिए। उनके मुताबिक, केवल व्यापक रूप से परिभाषित जनहित के आधार पर सामग्री ब्लॉक करने की शक्ति प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े सवाल खड़े कर सकती है।

यह मुद्दा डिजिटल मीडिया के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि ऑनलाइन समाचार संस्थान अपनी रिपोर्टों को वेबसाइट, मोबाइल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाते हैं। किसी सामग्री को ब्लॉक करने का आदेश मिलने पर उनकी पहुंच और कामकाज प्रभावित हो सकता है।

6. पत्रकारिता को स्पष्ट छूट देने की मांग

मीडिया प्रकाशकों का कहना है कि यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे क्षेत्रों में डेटा सुरक्षा नियमों के तहत पत्रकारिता से जुड़ी गतिविधियों के लिए कुछ विशेष प्रावधान या छूट मौजूद हैं। उनका तर्क है कि भारत में भी ऐसी स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे जनहित में की जाने वाली रिपोर्टिंग और व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के बीच संतुलन कायम रह सके।

प्रकाशकों के अनुसार, अगस्त में सरकार के साथ हुई एक बैठक में प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा को लेकर आश्वासन दिए गए थे। लेकिन उनका कहना है कि केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं और कानून में स्पष्ट लिखित सुरक्षा प्रावधान होना जरूरी है।

इस मामले में सरकार का रुख है कि वह प्रेस की स्वतंत्रता का सम्मान करती है। दूसरी ओर, मीडिया संस्थान चाहते हैं कि कानून के लागू होने पर पत्रकारों की जांच, उनके गोपनीय सूत्रों और जनहित में प्रकाशित खबरों को अनावश्यक बाधाओं का सामना न करना पड़े।

निष्कर्ष: डेटा सुरक्षा और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की चुनौती

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून को अदालत में चुनौती दिए जाने से व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच संतुलन का सवाल सामने आया है। एक तरफ नागरिकों की निजी जानकारी की रक्षा करना जरूरी है, तो दूसरी तरफ खोजी पत्रकारिता को ऐसे नियमों से बचाना भी महत्वपूर्ण है, जो तथ्य सामने लाने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।

अब इस मामले में अदालत की कार्यवाही और संबंधित पक्षों की दलीलों पर नजर रहेगी। विवाद का परिणाम यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि डिजिटल डेटा सुरक्षा के नियमों के साथ पत्रकारिता की स्वतंत्रता, खबरों के स्रोतों की गोपनीयता और जनहित से जुड़े सार्वजनिक रिकॉर्ड की सुरक्षा किस तरह सुनिश्चित की जाएगी।

फिलहाल, मीडिया प्रकाशकों की मुख्य मांग है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा दी जाए, ताकि निजता की रक्षा के साथ-साथ सार्वजनिक हित में खबरें प्रकाशित करने का अधिकार भी सुरक्षित रह सके।

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