
कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को सिख समुदाय से जुड़े कथित बयान के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। यह मामला साल 2024 में राहुल गांधी के अमेरिका दौरे के दौरान दिए गए एक कथित बयान से जुड़ा था। आरोप लगाया गया था कि उन्होंने कहा था कि भारत में सिख खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं।
इस मामले में याचिकाकर्ता ने वाराणसी की अदालत में राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। हालांकि, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने अक्टूबर 2025 में यह आवेदन खारिज कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सत्र न्यायालय का रुख किया, लेकिन वहां से भी राहत नहीं मिली। दोनों निचली अदालतों के आदेश को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद याचिका खारिज करते हुए कहा कि केवल अखबारों में प्रकाशित खबरों के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि की ओर से अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाना अपने आप में अपराध नहीं है। ऐसे बयान को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण प्राप्त है।
क्या है राहुल गांधी से जुड़ा पूरा मामला?
यह विवाद राहुल गांधी के साल 2024 में किए गए अमेरिका दौरे के दौरान दिए गए कथित बयान से शुरू हुआ था। उस समय कुछ अखबारों में प्रकाशित खबरों में दावा किया गया था कि राहुल गांधी ने सिख समुदाय की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि भारत में सिखों को सुरक्षित महसूस नहीं हो रहा है।
इन खबरों के आधार पर वाराणसी के याचिकाकर्ता नागेश्वर मिश्रा ने अदालत में आवेदन दाखिल किया था। उन्होंने मांग की थी कि राहुल गांधी के खिलाफ कथित बयान को लेकर एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया जाए।
याचिकाकर्ता का कहना था कि राहुल गांधी का बयान आपत्तिजनक है और इस मामले में कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। हालांकि, वाराणसी की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने 17 अक्टूबर 2025 को उनकी मांग स्वीकार नहीं की। अदालत ने राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने से इनकार कर दिया।
वाराणसी सेशन कोर्ट ने भी याचिका की थी खारिज
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत से आवेदन खारिज होने के बाद नागेश्वर मिश्रा ने इस फैसले को सत्र न्यायालय में चुनौती दी। उन्होंने निचली अदालत के आदेश पर पुनर्विचार करने की मांग की थी।
हालांकि, सत्र न्यायालय ने भी याचिकाकर्ता को राहत नहीं दी। 9 जुलाई को सत्र अदालत ने उनकी पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाई कोर्ट में यह चुनौती भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दाखिल की गई थी। याचिका में वाराणसी की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत और सत्र न्यायालय के दोनों आदेशों को रद्द करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता चाहता था कि राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का रास्ता साफ हो।
लेकिन हाई कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसलों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी।
हाई कोर्ट ने FIR की मांग क्यों ठुकराई?
न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए याचिका में लगाए गए आरोपों और उपलब्ध तथ्यों पर विचार किया। अदालत ने पाया कि राहुल गांधी के खिलाफ लगाए गए आरोपों का मुख्य आधार कुछ अखबारों में प्रकाशित खबरें हैं।
अदालत के मुताबिक, याचिका में राहुल गांधी के कथित बयान को लेकर कोई स्पष्ट तारीख, समय या स्थान नहीं बताया गया था। यानी यह जानकारी नहीं दी गई थी कि उन्होंने अमेरिका में किस दिन, किस समय और किस जगह पर यह बयान दिया था।
हाई कोर्ट ने कहा कि जब कथित घटना के संबंध में जरूरी बुनियादी जानकारी ही स्पष्ट नहीं है, तो केवल समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आपराधिक कार्रवाई शुरू करने के लिए आरोपों का पर्याप्त आधार होना जरूरी है। किसी समाचार रिपोर्ट में प्रकाशित कथन को ही अपने आप में एफआईआर दर्ज करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सवाल उठाना अपराध नहीं: हाई कोर्ट
इस मामले में हाई कोर्ट की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर रही। अदालत ने कहा कि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को समाज के किसी वर्ग की समस्याओं और अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाने का अधिकार है।
पीठ ने कहा कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सवाल उठाना या उनके हितों से जुड़े विषयों को सार्वजनिक रूप से उठाना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। अदालत के अनुसार, राहुल गांधी के कथित बयान को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण प्राप्त होगा।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इसके तहत लोग अपने विचार और राय व्यक्त कर सकते हैं। हालांकि, यह अधिकार कुछ संवैधानिक प्रतिबंधों के अधीन है। इस मामले में हाई कोर्ट ने माना कि याचिका में लगाए गए आरोपों के आधार पर राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का आदेश नहीं दिया जा सकता।
विदेश में बयान देना अनुचित हो सकता है, लेकिन अपराध नहीं
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी टिप्पणी की कि किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि की ओर से विदेश की धरती पर देश से जुड़े मुद्दों को उठाने को लेकर कुछ लोगों की अलग राय हो सकती है।
अदालत के मुताबिक, कुछ लोग इस तरह के बयान को अनुचित मान सकते हैं या इसे संसदीय लोकतंत्र की लंबे समय से चली आ रही परंपराओं से अलग समझ सकते हैं। लेकिन केवल इस आधार पर किसी बयान को अपराध नहीं माना जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी जनप्रतिनिधि के बयान को लेकर राजनीतिक या सामाजिक असहमति हो सकती है। लोग उसके तरीके और मंच पर सवाल उठा सकते हैं, लेकिन असहमति या आलोचना अपने आप में आपराधिक मामला दर्ज करने का आधार नहीं बन सकती।
इस टिप्पणी के जरिए हाई कोर्ट ने यह अंतर भी स्पष्ट किया कि किसी बयान को राजनीतिक रूप से अनुचित मानना और उसे कानूनी रूप से अपराध मानना दो अलग-अलग बातें हैं।
बयान गलत या तथ्यहीन हो तो सार्वजनिक बहस होनी चाहिए
अदालत ने अपने फैसले में लोकतांत्रिक व्यवस्था और सार्वजनिक बहस के महत्व पर भी जोर दिया। पीठ ने कहा कि यदि किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि की ओर से किसी व्यक्ति या विषय को लेकर दिया गया बयान गलत, भ्रामक या बिना पर्याप्त तथ्यों के पाया जाता है, तो उसका उचित जवाब संसदीय बहस और सार्वजनिक चर्चा के माध्यम से दिया जाना चाहिए।
अदालत के अनुसार, ऐसे बयानों की सच्चाई को खुली बहस और विचारों के स्वतंत्र आदान-प्रदान के जरिए परखा जा सकता है। लोकतंत्र में अलग-अलग विचारों को सामने आने और उन पर सवाल उठाने का अवसर होना चाहिए, ताकि तथ्यों की वास्तविकता सामने आ सके।
हाई कोर्ट ने कहा कि किसी बयान को गलत या अप्रमाणित मान लेने भर से उसे आपराधिक कार्रवाई का विषय नहीं बनाया जा सकता। इस मामले में राहुल गांधी के कथित बयान को भी संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत संरक्षण प्राप्त है।
इस टिप्पणी का मतलब यह है कि राजनीतिक बयानबाजी और सार्वजनिक मुद्दों पर असहमति का समाधान हमेशा आपराधिक मुकदमे के जरिए नहीं किया जा सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहस, सवाल-जवाब और सार्वजनिक विमर्श की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
राहुल गांधी के खिलाफ अब इस याचिका पर नहीं होगी कार्रवाई
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद राहुल गांधी के खिलाफ कथित सिख बयान को लेकर एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली याचिका खारिज हो गई है। अदालत ने वाराणसी की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत और सत्र न्यायालय के आदेशों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अदालत ने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की ओर से अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक बहस के महत्व पर टिप्पणी की है।
हालांकि, अदालत ने इस मामले में राहुल गांधी के कथित बयान की राजनीतिक या तथ्यात्मक सत्यता पर कोई व्यापक फैसला नहीं दिया। हाई कोर्ट का मुख्य विचार यह था कि याचिका में दिए गए आधार और उपलब्ध विवरण एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
इस तरह सिख समुदाय से जुड़े कथित बयान को लेकर राहुल गांधी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग को इलाहाबाद हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली और याचिका खारिज कर दी गई।



