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क्या कांग्रेस और TMC आएंगे करीब? अधीर रंजन चौधरी के बयान ने बढ़ाई सियासी हलचल

पश्चिम बंगाल की राजनीति में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बीच रिश्तों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित विपक्षी रैली के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा सोनिया गांधी को अपना नेता बताए जाने के बाद कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच राष्ट्रीय स्तर पर नजदीकियों के संकेत मिले हैं। हालांकि, बंगाल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी का रुख अब भी तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ सख्त बना हुआ है।

ममता बनर्जी के बयान के महज 72 घंटे बाद अधीर रंजन चौधरी ने स्पष्ट कर दिया कि तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ उनकी राजनीतिक लड़ाई जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि बंगाल में कांग्रेस को कमजोर करने के लिए पिछले 15 वर्षों में जो कुछ हुआ है, उसे भुलाया नहीं जा सकता। ममता बनर्जी के प्रति उनके राजनीतिक विरोध में फिलहाल किसी तरह की नरमी नहीं आने वाली है।

अधीर रंजन ने बुधवार को बहरामपुर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान अपना पक्ष रखा। उनके बयान से साफ हो गया कि दिल्ली में विपक्षी एकता की कोशिशों और पश्चिम बंगाल की जमीनी राजनीति के बीच अभी भी काफी अंतर है। एक तरफ राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों के एकजुट होने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ बंगाल में कांग्रेस और TMC के बीच राजनीतिक टकराव बरकरार है।

ममता बनर्जी के बयान के बाद बढ़ी कांग्रेस-TMC की नजदीकी की चर्चा

दरअसल, दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी दलों की रैली के दौरान ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी को अपना नेता बताकर राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा शुरू कर दी थी। उनके इस बयान को कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच संभावित नजदीकी के संकेत के तौर पर देखा गया।

राजनीतिक जानकारों के बीच यह सवाल उठने लगा कि क्या आने वाले समय में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति में एक साथ नजर आ सकते हैं? क्या भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता को मजबूत करने के लिए दोनों दल अपने पुराने मतभेद भुलाने की कोशिश करेंगे?

हालांकि, इस घटनाक्रम के बीच अधीर रंजन चौधरी का बयान कांग्रेस के भीतर मौजूद अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों को सामने लाता है। राष्ट्रीय राजनीति में भले ही विपक्षी दल एक मंच पर आने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के लिए तृणमूल कांग्रेस के साथ तालमेल बनाना आसान नहीं दिखाई देता।

अधीर रंजन चौधरी ने TMC पर लगाए गंभीर आरोप

बहरामपुर में मीडिया से बातचीत के दौरान अधीर रंजन चौधरी ने तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी ने पिछले 15 वर्षों में बंगाल में कांग्रेस के संगठन को भारी नुकसान पहुंचाया है।

उनका आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं को लगातार राजनीतिक दबाव और कथित उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। इसकी वजह से राज्य में कांग्रेस का सांगठनिक ढांचा कमजोर होता चला गया। उन्होंने कहा कि पार्टी को जो नुकसान हुआ है, वह केवल कुछ राजनीतिक गलतियों का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से चली आ रही घटनाएं और परिस्थितियां जिम्मेदार हैं।

अधीर रंजन के मुताबिक, बंगाल में कांग्रेस को दोबारा मजबूत बनाने के लिए सबसे पहले उन परिस्थितियों को समझना जरूरी है, जिनकी वजह से पार्टी का संगठन प्रभावित हुआ। ऐसे में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के साथ राजनीतिक समझौते की बात करना उनके लिए फिलहाल आसान नहीं है।

उन्होंने अपने पुराने रुख को दोहराते हुए संकेत दिया कि तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ उनका विरोध आगे भी जारी रहेगा। उनके इस बयान से यह स्पष्ट हो गया कि दिल्ली में विपक्षी एकता की तस्वीर चाहे जैसी हो, बंगाल में कांग्रेस की राजनीति का आधार अभी भी TMC का विरोध बना हुआ है।

गठबंधन पर अंतिम फैसला कांग्रेस हाईकमान करेगा

हालांकि, अधीर रंजन चौधरी ने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच भविष्य में किसी संभावित गठबंधन की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में राजनीतिक परिस्थितियां क्या मोड़ लेंगी, इस बारे में अभी कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।

उनके मुताबिक, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच किसी तरह के राजनीतिक समझौते या गठबंधन को लेकर फैसला पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व और पश्चिम बंगाल का प्रदेश नेतृत्व मिलकर करेगा। भविष्य की रणनीति परिस्थितियों और राजनीतिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तय की जाएगी।

इस बयान का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि अधीर रंजन चौधरी ने एक तरफ तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ अपना विरोध जारी रखने की बात कही, तो दूसरी तरफ गठबंधन की संभावनाओं पर फैसला पार्टी नेतृत्व के ऊपर छोड़ दिया।

इससे यह संकेत मिलता है कि कांग्रेस के भीतर राष्ट्रीय राजनीति और पश्चिम बंगाल की स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों को अलग-अलग नजरिए से देखा जा रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता की जरूरत को महत्व दिया जा सकता है, लेकिन बंगाल में कांग्रेस के सामने अपनी राजनीतिक जमीन बचाने और संगठन को मजबूत करने की चुनौती भी है।

अधीर रंजन और ममता बनर्जी के बीच पुराना राजनीतिक टकराव

अधीर रंजन चौधरी और ममता बनर्जी के बीच राजनीतिक विरोध कोई नई बात नहीं है। अधीर लंबे समय से पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की नीतियों और सरकार के मुखर आलोचक रहे हैं।

दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेदों का असर राज्य में कांग्रेस की चुनावी रणनीति पर भी दिखाई देता रहा है। वर्ष 2016 और 2021 के विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस और वामपंथी दलों की नजदीकी के पीछे भी तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ साझा राजनीतिक रुख एक महत्वपूर्ण वजह रहा था।

वहीं, 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी बंगाल में कांग्रेस और वाम दलों के बीच तालमेल की राजनीति देखने को मिली। इस दौरान अधीर रंजन चौधरी लगातार तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ हमलावर रहे।

करीब डेढ़ साल पहले भाजपा के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई को लेकर अधीर रंजन के एक ‘तालाब और नदी’ वाले बयान की भी काफी चर्चा हुई थी। उस समय उनके बयान को तृणमूल कांग्रेस के प्रति संभावित नरमी के संकेत के तौर पर देखा गया था। हालांकि, बाद में उन्होंने अपने राजनीतिक रुख को स्पष्ट करते हुए तृणमूल कांग्रेस का विरोध जारी रखा।

यूसुफ पठान से चुनाव हारने के बाद भी TMC के खिलाफ हमलावर रहे अधीर

अधीर रंजन चौधरी के राजनीतिक विरोध की चर्चा 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी खूब हुई थी। उस चुनाव में उन्हें बहरामपुर लोकसभा सीट पर तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार यूसुफ पठान से हार का सामना करना पड़ा था।

यह मुकाबला इसलिए भी चर्चा में रहा, क्योंकि बहरामपुर को लंबे समय तक अधीर रंजन चौधरी का मजबूत राजनीतिक क्षेत्र माना जाता था। इसके बावजूद तृणमूल कांग्रेस ने गुजरात से आने वाले पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान को यहां से चुनाव मैदान में उतारा और उन्हें जीत मिली।

चुनाव परिणाम के बाद अधीर रंजन चौधरी ने तृणमूल कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि अल्पसंख्यक वोटों को अपने पक्ष में एकजुट करने के उद्देश्य से TMC ने यूसुफ पठान को बहरामपुर से उम्मीदवार बनाया था।

इसके बाद 2026 के विधानसभा चुनाव में भी उन्हें इसी सीट पर हार का सामना करना पड़ा। लगातार चुनावी चुनौतियों के बावजूद अधीर रंजन का तृणमूल कांग्रेस के प्रति विरोधी रुख बरकरार रहा है।

क्या बंगाल में कांग्रेस और TMC के बीच बनेगा नया राजनीतिक समीकरण?

ममता बनर्जी के सोनिया गांधी को अपना नेता बताने और अधीर रंजन चौधरी के ताजा बयान के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक अहम सवाल खड़ा हो गया है। क्या कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस आने वाले समय में अपने पुराने मतभेदों को पीछे छोड़कर एक साथ आ सकते हैं?

राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों की एकजुटता को लेकर लगातार कोशिशें होती रही हैं। ऐसे में कांग्रेस और TMC के बीच बेहतर तालमेल विपक्षी राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन बंगाल में दोनों दलों के बीच लंबे समय से चला आ रहा राजनीतिक संघर्ष किसी भी संभावित गठबंधन के रास्ते में बड़ी चुनौती बन सकता है।

कांग्रेस के सामने एक तरफ राष्ट्रीय नेतृत्व की रणनीति के साथ तालमेल बनाए रखने की जिम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में अपनी अलग राजनीतिक पहचान और संगठन को मजबूत करने की जरूरत है। वहीं, अधीर रंजन चौधरी जैसे वरिष्ठ नेताओं का तृणमूल कांग्रेस के प्रति सख्त रुख इस चुनौती को और बढ़ा सकता है।

फिलहाल अधीर रंजन चौधरी ने गेंद कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के पाले में डाल दी है। उन्होंने साफ कर दिया है कि व्यक्तिगत तौर पर उनका तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक विरोध जारी रहेगा, लेकिन गठबंधन को लेकर अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व ही करेगा।

ऐसे में आने वाले दिनों में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के रिश्तों में क्या बदलाव आता है, यह देखना दिलचस्प होगा। राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की कोशिशें और बंगाल में स्थानीय राजनीतिक समीकरण इस पूरे मामले की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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