
Himachal Pradesh Glacial Lakes News: हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते तापमान और तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के बीच हिमाचल प्रदेश को लेकर एक चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। IIT मंडी के शोधकर्ताओं ने हिमाचल प्रदेश में 9 ऐसी ग्लेशियल झीलों की पहचान की है, जो तेजी से फैल रही हैं और भविष्य में बड़े खतरे का कारण बन सकती हैं। शोधकर्ताओं ने इन झीलों को संभावित ‘वॉटर बम’ करार दिया है।
वैज्ञानिकों की यह चेतावनी ऐसे समय सामने आई है, जब नेपाल में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों से जुड़े खतरों को फिर चर्चा में ला दिया है। माना गया था कि नेपाल की घटना में ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर ऐसी झील में गिरा, जिससे झील का पानी अचानक बाहर निकल गया और नीचे के इलाकों में तबाही मच गई।
IIT मंडी के शोधकर्ताओं के अनुसार, बढ़ता तापमान हिमालय के ग्लेशियरों को तेजी से पिघला रहा है, जिससे ऊंचाई वाले इलाकों में मौजूद ग्लेशियल झीलों का आकार और संख्या दोनों बढ़ रहे हैं। अगर इन झीलों को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार कमजोर होती है या अचानक टूट जाती है, तो भारी मात्रा में पानी, बर्फ और मलबा नीचे की ओर तेजी से बह सकता है।
हिमाचल में 9 ग्लेशियल झीलों पर सबसे ज्यादा खतरा
IIT मंडी की छह सदस्यीय शोध टीम ने हिमाचल प्रदेश के ऊंचाई वाले इलाकों का अध्ययन किया है। इस रिसर्च में चंबा और लाहौल-स्पीति क्षेत्रों में मौजूद नौ ग्लेशियल झीलों को विशेष रूप से संवेदनशील पाया गया है।
इनमें कालिकुंड, चंद्रताल, वासुकी, सुराई, क्या त्सो, योचे, समुद्र टापू, कासांग और गेफांग गैथ झीलें शामिल हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि इन झीलों की प्राकृतिक सीमाएं कमजोर पड़ने की स्थिति में ये बड़े पैमाने पर पानी छोड़ सकती हैं।
ऐसी घटना को Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF कहा जाता है। इसमें किसी ग्लेशियल झील की प्राकृतिक रोक अचानक टूट जाती है और झील में जमा पानी बहुत तेज गति से नीचे की ओर बहता है। पानी के साथ चट्टान, मिट्टी, बर्फ और अन्य मलबा भी बह सकता है, जिससे नदी घाटियों में भारी तबाही की स्थिति बन सकती है।
एक दशक में करीब 30 फीसदी बढ़ीं हिमालयी ग्लेशियल झीलें
शोध के दौरान सैटेलाइट तस्वीरों और अन्य उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों की संख्या में पिछले करीब एक दशक के दौरान लगभग 30 फीसदी की वृद्धि सामने आई है।
सिर्फ झीलों की संख्या ही नहीं बढ़ी है, बल्कि कई झीलों का क्षेत्रफल भी तेजी से बढ़ रहा है। इसका सीधा संबंध ग्लेशियरों के पिघलने और बढ़ते तापमान से जोड़ा जा रहा है।
IIT मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के संस्थापक चेयरपर्सन और इस छह सदस्यीय टीम का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर डेरिक्स पी. शुक्ला के मुताबिक, ग्लेशियल झीलों का तेजी से बढ़ना भविष्य में अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे को बढ़ा सकता है।
हिमाचल में 2,076 ग्लेशियल झीलों की हुई मैपिंग
शोधकर्ताओं ने वर्ष 2025 में हिमाचल प्रदेश में 3,500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर मौजूद 2,076 ग्लेशियल झीलों को मैप किया। यह संख्या वर्ष 2015 में दर्ज झीलों की तुलना में लगभग 710 अधिक है।
रिसर्च में इन झीलों के कुल क्षेत्रफल में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला। आंकड़ों के अनुसार, पिछले दस वर्षों में ग्लेशियल झीलों का कुल क्षेत्रफल लगभग 28.45 फीसदी बढ़ा है।
यह आंकड़ा हिमाचल प्रदेश और पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चिंता बढ़ाने वाला है, क्योंकि ग्लेशियल झीलों के आकार में वृद्धि का मतलब उनमें जमा पानी की मात्रा भी बढ़ सकती है। ऐसे में अगर किसी झील की प्राकृतिक सीमा अचानक टूटती है तो नीचे बसे क्षेत्रों तक पहुंचने वाला पानी पहले की तुलना में काफी अधिक हो सकता है।
गेफांग गैथ झील में सबसे बड़ा बदलाव
रिसर्च में कुछ ग्लेशियल झीलों में हुए बदलाव विशेष रूप से सामने आए हैं। लाहौल-स्पीति की गेफांग गैथ झील का क्षेत्रफल ग्लेशियर के पिघलने के कारण करीब 2.44 लाख वर्ग मीटर तक बढ़ा है।
इसी तरह किन्नौर की कासांग झील के क्षेत्रफल में लगभग 1.50 लाख वर्ग मीटर की वृद्धि दर्ज की गई। वहीं कालिकुंड झील, जो कांगड़ा और चंबा क्षेत्र से जुड़ी है, का क्षेत्रफल लगभग 1.20 लाख वर्ग मीटर बढ़ा है।
इन बदलावों को सिर्फ भौगोलिक परिवर्तन के तौर पर नहीं देखा जा सकता। विशेषज्ञों के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्लेशियर के पिघलने से झील का आकार बढ़ने पर उसके आसपास की प्राकृतिक संरचना पर भी दबाव बढ़ सकता है।
कालिकुंड झील को लेकर क्यों है खास चिंता?
शोधकर्ताओं ने कालिकुंड झील को विशेष रूप से संवेदनशील बताया है। इसके आसपास की ढलानें काफी खड़ी हैं। ऐसी भौगोलिक स्थिति में अगर अचानक कोई भूस्खलन होता है या आसपास की चट्टानों और बर्फ में बड़ा बदलाव आता है, तो झील में तेज हलचल पैदा हो सकती है।
किसी बड़े भूस्खलन के कारण झील में अचानक मलबा गिरने से पानी का स्तर तेजी से बढ़ सकता है। इसी तरह भूकंप या अन्य भूगर्भीय गतिविधियां भी प्राकृतिक बांध को नुकसान पहुंचा सकती हैं। ऐसी परिस्थितियों में पानी अचानक बाहर निकलने पर नीचे की घाटियों में गंभीर बाढ़ आ सकती है।
15 से ज्यादा पुल और कई आबादी वाले क्षेत्र खतरे में
IIT मंडी की स्टडी ने इस संभावित खतरे का मानवीय और बुनियादी ढांचे पर असर भी सामने रखा है। शोध के अनुसार, इन ग्लेशियल झीलों से बनने वाले संभावित बाढ़ क्षेत्र में 15 से ज्यादा पुल, कई आबादी वाले इलाके और महत्वपूर्ण संस्थान आते हैं।
इनमें शैक्षणिक और स्वास्थ्य संस्थान भी शामिल हैं। इसका मतलब है कि अगर किसी संवेदनशील ग्लेशियल झील से अचानक पानी का बड़ा प्रवाह नीचे की ओर आता है, तो सिर्फ प्राकृतिक इलाकों को ही नहीं, बल्कि सड़क, पुल, गांव और सार्वजनिक सुविधाओं को भी नुकसान पहुंच सकता है।
यही वजह है कि वैज्ञानिक ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी और संभावित GLOF क्षेत्रों की पहचान पर जोर दे रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा ग्लेशियल झीलों का खतरा
हिमालय को दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में गिना जाता है। बढ़ता वैश्विक तापमान यहां के ग्लेशियरों को प्रभावित कर रहा है। ग्लेशियरों के पीछे हटने और उनके पिघलने से कई जगहों पर पानी जमा होकर नई झीलें बन रही हैं या पहले से मौजूद झीलों का आकार बढ़ रहा है।
ग्लेशियर के पिघलने की प्रक्रिया जितनी तेज होगी, उतना ही अधिक पानी इन झीलों में जमा हो सकता है। यदि झील की प्राकृतिक सीमा मजबूत बनी रहती है तो तत्काल खतरा नहीं होता, लेकिन भूस्खलन, भूकंप, बर्फ का बड़ा हिस्सा टूटकर गिरना या अन्य भूगर्भीय घटनाएं अचानक स्थिति बदल सकती हैं।
इसी कारण विशेषज्ञ ग्लेशियल झीलों को केवल सामान्य जल स्रोत के रूप में नहीं, बल्कि संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के हिस्से के रूप में देखने की जरूरत बता रहे हैं।
पर्यटन गतिविधियां भी बढ़ा सकती हैं परेशानी
शोधकर्ताओं ने ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के पीछे केवल बढ़ते तापमान को ही नहीं देखा, बल्कि मानवीय गतिविधियों को लेकर भी चिंता जताई है। हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ता पर्यटन पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव डाल रहा है।
पर्यटकों की बढ़ती आवाजाही से पैदा होने वाली धूल ग्लेशियरों की सतह पर जम सकती है। साफ बर्फ और बर्फीली सतह की तुलना में गहरे रंग की धूल सूर्य की अधिक ऊर्जा अवशोषित करती है। इससे बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
इसलिए हिमाचल के संवेदनशील ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है। वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्रों में विकास और पर्यटन की गतिविधियों की योजना बनाते समय ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखना होगा।
क्या हिमाचल में आ सकती है GLOF जैसी बड़ी आपदा?
IIT मंडी की स्टडी का मतलब यह नहीं है कि इन नौ झीलों से तत्काल बाढ़ आने वाली है। लेकिन शोधकर्ताओं ने इनके तेजी से बढ़ते आकार और आसपास की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए भविष्य के संभावित खतरे को लेकर चेतावनी दी है।
ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड की सबसे बड़ी समस्या यह है कि ऐसी घटना बेहद तेजी से हो सकती है। झील से निकलने वाला पानी कुछ ही समय में नीचे की घाटियों की ओर बढ़ सकता है। अगर पहले से चेतावनी और निकासी की व्यवस्था मजबूत नहीं हो, तो नुकसान को रोकना मुश्किल हो सकता है।
इसलिए वैज्ञानिक अध्ययन, सैटेलाइट मॉनिटरिंग, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और संवेदनशील क्षेत्रों में बेहतर आपदा प्रबंधन को मजबूत करना बेहद जरूरी है।
हिमाचल के लिए बढ़ती चुनौती
IIT मंडी की यह रिसर्च हिमाचल प्रदेश के साथ-साथ पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। 2,076 ग्लेशियल झीलों की पहचान, एक दशक में झीलों की संख्या में करीब 710 की वृद्धि और कुल क्षेत्रफल में 28.45 फीसदी का विस्तार यह संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन का असर हिमालयी भू-दृश्य पर तेजी से दिखाई दे रहा है।
अब चुनौती केवल ग्लेशियरों के पिघलने को समझने की नहीं है, बल्कि यह पता लगाने की भी है कि कौन सी झीलें सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं और उनके नीचे रहने वाली आबादी को संभावित आपदा से कैसे सुरक्षित रखा जाए।
अगर समय रहते संवेदनशील झीलों की निगरानी, जोखिम वाले इलाकों की मैपिंग और चेतावनी प्रणाली को मजबूत किया जाता है, तो भविष्य में होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। हिमाचल की ये तेजी से बढ़ती ग्लेशियल झीलें फिलहाल वैज्ञानिकों के लिए जलवायु परिवर्तन और आपदा जोखिम का गंभीर संकेत जरूर बन गई हैं।



