
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने शुक्रवार को देशभर में बिगड़ते वायु गुणवत्ता स्तर पर गंभीर चिंता जताते हुए सदन में तुरंत और सर्वदलीय चर्चा की मांग की। केंद्र सरकार ने भी इस मुद्दे पर बहस के लिए अपनी सहमति जताई।
“जहरीली हवा हमारे शहरों को ढक चुकी है” — राहुल गांधी
राहुल गांधी ने कहा कि देश के बड़े शहर खतरनाक धुंध की चादर में जी रहे हैं।
उन्होंने कहा:
“हमारे करोड़ों बच्चे फेफड़ों की बीमारियों से जूझ रहे हैं। बुजुर्गों को सांस लेना मुश्किल हो रहा है। लोग कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का सामना कर रहे हैं। यह राजनीतिक या वैचारिक मुद्दा नहीं है — इस पर सरकार और विपक्ष दोनों सहमत हैं कि प्रदूषण से निपटना ही होगा।”
उन्होंने प्रस्ताव रखा कि बहस का उद्देश्य एक-दूसरे पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि जनता के लिए भविष्य की कार्ययोजना तैयार करना होना चाहिए।
“संसद से जुड़े हर व्यक्ति की सेहत पर खतरा”
राहुल गांधी ने बताया कि सांसद, अधिकारी, ड्राइवर, सफाईकर्मी और सुरक्षा कर्मी रोज़ाना जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं।
उन्होंने कहा कि जब दिल्ली में प्रदूषण चरम पर होता है, तब संसद का सत्र आयोजित करना सभी के लिए गंभीर जोखिम पैदा करता है।
संसद का सत्र दूसरे शहरों में कराने का सुझाव
बीजेडी सांसद सुलोचना मंगराज ने इस मुद्दे पर एक और सुझाव रखते हुए कहा कि सर्दियों में संसद के सत्र दिल्ली के बजाय उन शहरों में कराए जा सकते हैं जहाँ वायु गुणवत्ता बेहतर है।
उन्होंने भुवनेश्वर, हैदराबाद, गांधीनगर, बेंगलुरु, गोवा और देहरादून जैसे शहरों के नाम सुझाए।
उन्होंने कहा:
“यह राजनीति का मुद्दा नहीं है, यह जीवन और सम्मान का सवाल है। जिस तरह ओडिशा चक्रवात के दौरान लाखों लोगों को तुरंत सुरक्षित स्थान पर ले जाता है, वैसे ही केंद्र सरकार भी संसद के दो सत्र दूसरे शहरों में आयोजित कर सकती है।”
सरकार से तुरंत विचार-विमर्श शुरू करने की मांग
मंगराज ने केंद्र से अपील की कि वह जल्द से जल्द विभिन्न विकल्पों पर औपचारिक चर्चा शुरू करे, ताकि सर्दियों में संसद के सत्र उन शहरों में आयोजित किए जा सकें जहाँ प्रदूषण स्तर कम हो।
दिल्ली में सर्दियों में प्रदूषण का स्तर क्यों बढ़ता है?
अक्टूबर से जनवरी के बीच दिल्ली की हवा निम्न कारणों से बेहद खराब हो जाती है:
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पराली जलाना
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वाहन प्रदूषण
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निर्माण कार्यों की धूल
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ठंड में हवा की गति कम होने से प्रदूषक नीचे जम जाना
इसी अवधि में संसद के शीतकालीन सत्र और कई अहम विधायी कार्य भी होते हैं, जिससे चिंता और बढ़ जाती है।



