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New India-US Critical Minerals Deal: चीन की ‘सप्लाई चेन ब्लैकमेलिंग’ का अंत! क्वाड का 20 अरब डॉलर का महा-प्लान; भारत में बनेंगे विशेष ‘रेयर अर्थ कॉरिडोर्स’

27 मई, 2026 | New India-US Critical Minerals Deal: वैश्विक कूटनीति और औद्योगिक बाजार में एक ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीजिंग दौरे के ठीक अगले दिन, भारत की मेजबानी में नई दिल्ली के भीतर क्वाड (Quad) देशों की एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक से निकले फैसलों ने दुनिया भर की तकनीकी और सैन्य आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains) के समीकरण को हमेशा के लिए बदलने की नींव रख दी है।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) के चार दिवसीय भारत दौरे के दौरान, नई दिल्ली और वाशिंगटन ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्रिटिकल मिनरल्स (Critical Minerals – महत्वपूर्ण खनिज) और रेयर अर्थ्स (Rare Earths – दुर्लभ तत्व) की माइनिंग और प्रोसेसिंग को सुरक्षित करने के लिए एक ऐतिहासिक द्विपक्षीय समझौते (Framework Agreement) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह कदम सीधे तौर पर वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर चीन के एकतरफा एकाधिकार (Monopoly) और उसके कड़े निर्यात नियंत्रणों को चुनौती देने के लिए उठाया गया है।

क्वाड का $20 बिलियन का दांव: चीन के एकाधिकार को तोड़ने की तैयारी

अमेरिकी विदेश मंत्री के इस दौरे के दौरान केवल भारत-अमेरिका का द्विपक्षीय समझौता ही नहीं हुआ, बल्कि क्वाड (Quad – भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) गठबंधन ने भी ऊर्जा सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों के लिए एक विशाल संयुक्त ढांचे का एलान किया है。

चीन के ‘आर्थिक दमन’ (Economic Coercion) और मनमाने निर्यात प्रतिबंधों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए, क्वाड देशों ने इस क्षेत्र में लचीली आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने के लिए सरकारी और निजी पूंजी को मिलाकर 20 अरब डॉलर (USD 20 Billion) का भारी-भरकम फंड निवेश करने का संकल्प लिया है。 क्वाड के संयुक्त बयान में सीधे तौर पर चीन का नाम लिए बिना कहा गया:

“हम आर्थिक दमन, मनमाने निर्यात प्रतिबंधों, कीमतों में हेरफेर और गैर-बाजार नीतियों के इस्तेमाल पर अपनी गंभीर चिंता दोहराते हैं, विशेष रूप से क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में जो वैश्विक औद्योगिक क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। हमें किसी भी एक देश पर निर्भरता से बचना होगा।”

क्रिटिकल मिनरल्स क्या हैं और ये क्यों हैं दुनिया के लिए जरूरी?

क्रिटिकल मिनरल्स (महत्वपूर्ण खनिज) गैर-ईंधन खनिज होते हैं, जो आज की आधुनिक दुनिया और भविष्य की तकनीकों की रीढ़ हैं। इनका उपयोग हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, सेमीकंडक्टर (Semiconductors), ड्रोन, इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बैटरी, रक्षा उपकरण, एडवांस वायरिंग और मिलिट्री हार्डवेयर बनाने में किया जाता है।

अमेरिकी ऊर्जा अधिनियम 2020 (US Energy Act of 2020) के अनुसार, ये खनिज किसी भी देश की आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इतने अनिवार्य हैं कि इनकी आपूर्ति में बाधा आने से पूरे देश की व्यवस्था चरमरा सकती है। अमेरिका की 2025 की क्रिटिकल मिनरल्स की सूची में एल्युमिनियम, कोबाल्ट, लिथियम, निकेल, टाइटेनियम, गैलियम और ग्रेफाइट सहित कुल कई तत्व शामिल हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका इनमें से 12 खनिजों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है, जबकि 29 अन्य खनिजों के लिए अपनी आधी से अधिक जरूरतों को आयात के जरिए पूरा करता है।

द चाइना फैक्टर: क्यों डरी हुई है दुनिया?

क्रिटिकल मिनरल्स की इस पूरी सूची में 17 विशेष ‘रेयर अर्थ एलिमेंट्स’ (दुर्लभ तत्व) शामिल हैं, जिनकी माइनिंग और प्रोसेसिंग बेहद जटिल होती है और इससे भारी मात्रा में जहरीला कचरा निकलता है। चीन के पास दुनिया के इन 12 दुर्लभ तत्वों का विशाल भंडार मौजूद है।

दुनिया भर में होने वाली कुल रेयर अर्थ माइनिंग का लगभग 70 प्रतिशत अकेले चीन के नियंत्रण में है। इतना ही नहीं, चीन वैश्विक स्तर पर इन खनिजों के 60 प्रतिशत भंडार का मालिक है और दुनिया की 90 प्रतिशत रेयर अर्थ प्रोसेसिंग अकेले चीन में होती है। इसी भारी निर्भरता को कम करने और किसी भी संभावित भू-राजनीतिक संकट से बचने के लिए ट्रंप प्रशासन के तहत वाशिंगटन अब भारत को इस क्षेत्र के सबसे बड़े विकल्प के रूप में तैयार कर रहा है।

भारत कैसे बनेगा इस डील का सबसे बड़ा विजेता?

इस वैश्विक रणनीति में भारत सबसे केंद्रीय और फायदे वाली भूमिका में उभर कर सामने आया है। भारत के खान मंत्रालय (Ministry of Mines) की जुलाई 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के पास 30 क्रिटिकल मिनरल्स का बड़ा भंडार मौजूद है, जिसमें लिथियम, कोबाल्ट, तांबा, ग्रेफाइट, निकेल, टाइटेनियम और टंगस्टन जैसे बेहद कीमती खनिज शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त, भारत के पास रेयर-अर्थ मिनरल्स का एक अप्रत्याशित खजाना है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत के पास लगभग 1.31 करोड़ टन (13.15 मिलियन टन) मोनाजाइट का भंडार है, जिसमें अनुमानित 72.3 लाख टन रेयर-अर्थ ऑक्साइड (REO) मौजूद हैं। ये खनिज मुख्य रूप से भारत के तटीय राज्यों की रेत और अंतर्देशीय जलोढ़ मिट्टी में पाए जाते हैं:

  • ओडिशा (Odisha)

  • केरल (Kerala)

  • तमिलनाडु (Tamil Nadu)

  • आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh)

  • पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र और झारखंड

‘रेयर अर्थ कॉरिडोर्स’ का निर्माण:

भारत सरकार ने इस दिशा में बड़ी छलांग लगाते हुए बजट में ओडिशा, तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश में विशेष ‘रेयर अर्थ कॉरिडोर्स’ (Rare Earth Corridors) बनाने की नीतिगत घोषणा की है। इन कॉरिडोर्स का उपयोग न केवल इन दुर्लभ खनिजों के खनन और प्रसंस्करण के लिए किया जाएगा, बल्कि यहां रिसर्च और इलेक्ट्रिक वाहनों व पवन टर्बाइनों में इस्तेमाल होने वाले हाई-परफॉर्मेंस मैग्नेट्स (चुंबक) का निर्माण भी किया जाएगा。

क्या है भारत-अमेरिका समझौते के अंदर?

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस समझौते पर हस्ताक्षर के बाद खुशी जाहिर करते हुए कहा, “यह कदम बेहद समय पर उठाया गया और अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह ढांचा खनन, प्रसंस्करण, रीसाइक्लिंग और संबंधित निवेश सहित संपूर्ण महत्वपूर्ण खनिज और दुर्लभ पृथ्वी आपूर्ति श्रृंखला में हमारे सहयोग को गहरा करेगा।”

अमेरिकी दूतावास के अनुसार, इस समझौते के माध्यम से वाशिंगटन और नई दिल्ली मिलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशील आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाजार की दमनकारी नीतियों से बचाएंगे और एकल-स्रोत एकाधिकार (यानी चीन पर निर्भरता) के जोखिम को कम करेंगे।

क्रिटिकल मिनरल्स और भारत-यूएस डील: एक नज़र में मुख्य फैक्ट्स

रणनीतिक पहलू वर्तमान स्थिति / आंकड़े भविष्य का प्रभाव और रणनीति
क्वाड का कुल फंड $20 बिलियन डॉलर की सार्वजनिक और निजी पूंजी का निवेश। चीन के सप्लाई चेन प्रभुत्व और मूल्य हेरफेर को कड़ी टक्कर देना।
चीन का वैश्विक दबदबा 70% माइनिंग और 90% रेयर अर्थ प्रोसेसिंग पर एकाधिकार। अमेरिका और मित्र देशों द्वारा आपूर्ति नेटवर्क का तेजी से विविधीकरण।
भारत का कुल खजाना 30 महत्वपूर्ण खनिज और 1.31 करोड़ टन मोनाजाइट भंडार। घरेलू स्तर पर ‘रेयर अर्थ कॉरिडोर्स’ के जरिए औद्योगिक क्रांति की शुरुआत।
मुख्य उपयोग क्षेत्र डिफेंस, सेमीकंडक्टर, ईवी बैटरी, ड्रोन और विंड टर्बाइन। भारत हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग का एक बड़ा वैश्विक हब बनकर उभरेगा।

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