
Raghav Chadha Z Security: देश की राजनीति में इन दिनों Raghav Chadha को मिलने वाली सुरक्षा को लेकर जोरदार चर्चा हो रही है। पंजाब सरकार द्वारा उनकी Z+ सुरक्षा हटाए जाने के बाद अब खबरें सामने आ रही हैं कि केंद्र सरकार उन्हें Z श्रेणी की सुरक्षा देने पर विचार कर रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने लोगों के बीच एक नया सवाल खड़ा कर दिया है—आखिर यह Z सुरक्षा होती क्या है और इसे किस आधार पर दिया जाता है?
आम लोगों के लिए VIP सुरक्षा व्यवस्था हमेशा से एक जिज्ञासा का विषय रही है। कौन-सा नेता कितनी सुरक्षा में चलता है, कितने कमांडो उसके साथ रहते हैं और इस पूरी व्यवस्था पर कितना खर्च आता है—ये सवाल अक्सर लोगों के मन में उठते हैं। आइए इस खबर के बहाने समझते हैं Z श्रेणी सुरक्षा की पूरी प्रक्रिया और इसके पीछे का खर्च।
Z श्रेणी सुरक्षा क्या होती है?
भारत में VIP सुरक्षा को अलग-अलग स्तरों में बांटा गया है, जिनमें Z श्रेणी को काफी मजबूत सुरक्षा कवच माना जाता है। यह सुरक्षा उन लोगों को दी जाती है जिनकी जान को गंभीर खतरा होता है। Z सुरक्षा के तहत संबंधित व्यक्ति के साथ हर समय एक बड़ी सुरक्षा टीम मौजूद रहती है।
इस श्रेणी में आमतौर पर करीब 22 सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं, जिनमें Central Reserve Police Force (CRPF), Indo-Tibetan Border Police (ITBP) और स्थानीय पुलिस के जवान शामिल होते हैं। इसके अलावा, सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए National Security Guard (NSG) के कमांडो भी तैनात किए जा सकते हैं।
सुरक्षा का मजबूत घेरा और 24×7 निगरानी
Z श्रेणी की सुरक्षा सिर्फ जवानों की संख्या तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह एक पूरी रणनीतिक व्यवस्था होती है। इसमें सुरक्षाकर्मी आधुनिक हथियारों से लैस होते हैं और उन्हें विशेष ट्रेनिंग दी जाती है ताकि वे किसी भी आपात स्थिति से निपट सकें।
इस सुरक्षा के तहत VIP के साथ एक एस्कॉर्ट वाहन भी चलता है, जो हर समय उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करता है। कमांडो दिन-रात, 24 घंटे उनकी निगरानी करते हैं ताकि किसी भी खतरे को समय रहते टाला जा सके।
Z+ और Z सुरक्षा में क्या अंतर है?
Z श्रेणी से एक स्तर ऊपर Z+ सुरक्षा होती है, जिसे देश की सबसे मजबूत सुरक्षा व्यवस्थाओं में गिना जाता है। Z+ में करीब 55 सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं, जो सुरक्षा का और भी सख्त घेरा बनाते हैं।
राघव चड्ढा के मामले में चर्चा है कि उन्हें कुछ राज्यों में Z सुरक्षा और अन्य स्थानों पर Y+ सुरक्षा दी जा सकती है। यह पूरी तरह खतरे के स्तर और स्थान के आधार पर तय किया जाता है।
सुरक्षा देने का फैसला कैसे होता है?
किसी भी व्यक्ति को सुरक्षा देना एक संवेदनशील और गोपनीय प्रक्रिया होती है। इसका फैसला सीधे तौर पर खतरे के आकलन पर आधारित होता है। इसके लिए खुफिया एजेंसियां जैसे इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) और राज्य की सुरक्षा एजेंसियां रिपोर्ट तैयार करती हैं।
इन रिपोर्ट्स को Ministry of Home Affairs के पास भेजा जाता है, जहां अंतिम निर्णय लिया जाता है। अगर रिपोर्ट में यह स्पष्ट होता है कि व्यक्ति को गंभीर खतरा है, तभी उसे इस तरह की सुरक्षा प्रदान की जाती है।
Z सुरक्षा पर कितना खर्च आता है?
VIP सुरक्षा व्यवस्था सिर्फ सुरक्षा ही नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक खर्च भी है। Z श्रेणी की सुरक्षा पर हर महीने लगभग 15 से 20 लाख रुपये तक का खर्च आता है। इसमें सुरक्षाकर्मियों की सैलरी, उनके रहने-खाने की व्यवस्था, हथियार और वाहनों का खर्च शामिल होता है।
अगर Z+ सुरक्षा की बात करें, तो इसका खर्च और भी ज्यादा होता है, जो करीब 40 से 50 लाख रुपये प्रति माह तक पहुंच सकता है। यह आंकड़े बताते हैं कि VIP सुरक्षा व्यवस्था कितनी महंगी होती है।
यह खर्च कौन उठाता है?
यह एक अहम सवाल है कि इस भारी खर्च का भुगतान कौन करता है। अगर किसी संवैधानिक पद पर बैठे नेता या सरकारी अधिकारी को सुरक्षा दी जाती है, तो उसका खर्च सरकार उठाती है। यह पैसा सीधे तौर पर सरकारी बजट से आता है, यानी जनता के टैक्स का पैसा इसमें खर्च होता है।
हालांकि, अगर कोई उद्योगपति या निजी व्यक्ति अपनी सुरक्षा के लिए इस तरह का कवर मांगता है, तो उसे इसका पूरा खर्च खुद उठाना पड़ता है।
क्यों चर्चा में है यह मुद्दा?
राघव चड्ढा की सुरक्षा में बदलाव की खबरों ने इस पूरे मुद्दे को सुर्खियों में ला दिया है। एक तरफ जहां सुरक्षा को लेकर चिंता जताई जा रही है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है।
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की VIP सुरक्षा व्यवस्था और उसके खर्च पर भी बहस छेड़ता है।
निष्कर्ष
राघव चड्ढा की सुरक्षा को लेकर उठी चर्चा ने एक बार फिर VIP सुरक्षा व्यवस्था को केंद्र में ला दिया है। Z श्रेणी की सुरक्षा सिर्फ एक सुरक्षा कवच नहीं, बल्कि एक जटिल और महंगी व्यवस्था है, जो खतरे के स्तर के आधार पर तय की जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में जहां सुरक्षा एजेंसियों की अहम भूमिका होती है, वहीं इसके खर्च का बोझ भी एक बड़ा मुद्दा बनकर सामने आता है।



