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भारत के पास दुश्मन के सैटेलाइट को गिराने की ताकत? मिशन शक्ति के बाद अंतरिक्ष युद्ध में कहां खड़ा है देश

अंतरिक्ष को लंबे समय तक विज्ञान, संचार और खोज के क्षेत्र के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन अब यह वैश्विक सुरक्षा और सैन्य रणनीति का भी अहम हिस्सा बनता जा रहा है। दुनिया की बड़ी सैन्य शक्तियां अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स पर अपनी निर्भरता बढ़ा रही हैं। निगरानी, नेविगेशन, संचार और सैन्य अभियानों के लिए इन सैटेलाइट्स की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो चुकी है। ऐसे में किसी देश के सैटेलाइट को निष्क्रिय करने या नष्ट करने की क्षमता भविष्य के संघर्षों में रणनीतिक महत्व रख सकती है।

इसी बीच अमेरिका की ओर से कक्षा में स्पेस-कंट्रोल हथियारों की मौजूदगी स्वीकार किए जाने की खबरों ने अंतरिक्ष के सैन्यीकरण को लेकर बहस तेज कर दी है। रूस और चीन भी अंतरिक्ष आधारित सैन्य तकनीकों पर काम कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम को कई रिपोर्टों में नए “स्टार वॉर्स” यानी अंतरिक्ष में संभावित हथियारों की होड़ के संदर्भ में देखा जा रहा है।

ऐसे में भारत की स्थिति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। क्या भारत के पास दुश्मन के सैटेलाइट को नष्ट करने की क्षमता है? भारत ने इस दिशा में अब तक क्या साबित किया है और मिशन शक्ति का इसमें क्या महत्व है? आइए समझते हैं।

अंतरिक्ष क्यों बन रहा है युद्ध का नया मोर्चा?

अंतरिक्ष का सैन्य इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है। शीत युद्ध के दौर से ही अमेरिका, रूस और अन्य देश सैटेलाइट्स का इस्तेमाल संचार, निगरानी, मौसम की जानकारी और नेविगेशन जैसे कामों के लिए करते रहे हैं। समय के साथ सैन्य अभियानों में इनकी भूमिका और बढ़ती गई।

आज किसी आधुनिक सेना के लिए सैटेलाइट नेटवर्क बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। मिसाइलों और सैन्य वाहनों की लोकेशन से लेकर संचार और निगरानी तक कई काम अंतरिक्ष आधारित प्रणालियों पर निर्भर करते हैं। अमेरिका का GPS इसका प्रमुख उदाहरण है। भारत ने भी अपनी रणनीतिक जरूरतों के लिए NavIC जैसी स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली विकसित की है।

यही वजह है कि अब केवल अपने सैटेलाइट को सुरक्षित रखना ही पर्याप्त नहीं माना जाता। संभावित संघर्ष की स्थिति में दुश्मन के अंतरिक्ष आधारित नेटवर्क को बाधित करने की क्षमता भी रणनीतिक महत्व हासिल कर रही है।

अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ क्यों बढ़ रही है?

अंतरिक्ष में सैन्य प्रतिस्पर्धा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब सिर्फ ऐसे सैटेलाइट विकसित करने पर ध्यान नहीं है जो जानकारी उपलब्ध कराएं, बल्कि ऐसी तकनीकों पर भी काम हो रहा है जिनका इस्तेमाल दूसरे अंतरिक्ष यानों को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।

इसी कारण अंतरिक्ष आधारित हथियारों को लेकर अमेरिका, रूस और चीन की गतिविधियां लगातार चर्चा में रहती हैं। यदि किसी देश की संचार या निगरानी क्षमता उसके सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भर है, तो उस नेटवर्क को नुकसान पहुंचाना उसके सैन्य अभियानों को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि, अंतरिक्ष में किसी सैटेलाइट को नष्ट करने की कार्रवाई बेहद जटिल है। इससे पैदा होने वाला अंतरिक्ष मलबा दूसरे सैटेलाइट्स के लिए भी खतरा बन सकता है। यही वजह है कि एंटी-सैटेलाइट हथियारों के परीक्षण और इस्तेमाल को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी मौजूद हैं।

चीन ने शिजियान-21 से दिखाई थी तकनीकी क्षमता

चीन की अंतरिक्ष गतिविधियों का एक उदाहरण शिजियान-21 सैटेलाइट से जुड़ा है। 2022 में इस सैटेलाइट ने एक निष्क्रिय सैटेलाइट को पकड़कर उसकी कक्षा बदलने की क्षमता का प्रदर्शन किया था। इस तरह की तकनीक को ऑन-ऑर्बिट सर्विसिंग या अंतरिक्ष में वस्तुओं के साथ संपर्क की क्षमता के संदर्भ में भी देखा जाता है।

हालांकि ऐसी तकनीक का इस्तेमाल केवल हथियार के रूप में ही हो, यह जरूरी नहीं है। अंतरिक्ष यानों की मरम्मत, ईंधन भरने, कक्षा बदलने या पुराने सैटेलाइट को हटाने जैसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए भी ऐसी क्षमताएं विकसित की जा सकती हैं। लेकिन सैन्य रणनीतिकारों के लिए यही तकनीक संभावित एंटी-सैटेलाइट क्षमताओं के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

रूस के अंतरिक्ष हथियारों को लेकर भी उठे सवाल

रूस की अंतरिक्ष सैन्य क्षमताओं को लेकर भी अमेरिका और पश्चिमी देशों की ओर से समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है। 2024 में अमेरिकी अधिकारियों ने रूस द्वारा अंतरिक्ष आधारित परमाणु हथियार विकसित करने को लेकर दावे किए थे। इन दावों में ऐसे हथियार की आशंका जताई गई थी जो अंतरिक्ष में रहकर दूसरे सैटेलाइट्स के लिए खतरा पैदा कर सकता है।

हालांकि, ऐसे संवेदनशील सैन्य दावों के मामले में देशों के आधिकारिक बयानों और उपलब्ध स्वतंत्र जानकारी को अलग-अलग देखना जरूरी है। अंतरिक्ष हथियारों को लेकर अमेरिका, रूस और चीन के बीच आरोप-प्रत्यारोप ने इस विषय को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

अमेरिका की घोषणा के बाद बढ़ी चर्चा

अमेरिका द्वारा पृथ्वी की कक्षा में स्पेस-कंट्रोल हथियारों की मौजूदगी स्वीकार किए जाने की खबरों ने अंतरिक्ष के सैन्यीकरण को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। रिपोर्टों के अनुसार, इन क्षमताओं का उद्देश्य अंतरिक्ष में मौजूद प्रणालियों को नियंत्रित या प्रभावित करने की क्षमता से जुड़ा है।

रूस और चीन ने अंतरिक्ष के हथियारीकरण का विरोध किया है और इसे रोकने की आवश्यकता पर जोर दिया है। दूसरी ओर, दुनिया की प्रमुख सैन्य शक्तियों के बीच अंतरिक्ष तकनीक को लेकर प्रतिस्पर्धा लगातार जारी है।

ऐसे माहौल में भारत के लिए भी अपनी अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की सुरक्षा और संभावित खतरों से निपटने की क्षमता महत्वपूर्ण हो जाती है।

क्या भारत दुश्मन के सैटेलाइट को गिरा सकता है?

भारत ने 2019 में मिशन शक्ति के जरिए यह साबित किया था कि उसके पास एंटी-सैटेलाइट यानी ASAT क्षमता मौजूद है। इस परीक्षण में भारत ने लो-अर्थ ऑर्बिट में मौजूद अपने ही सैटेलाइट को इंटरसेप्टर के जरिए सफलतापूर्वक नष्ट किया था।

मिशन शक्ति के तहत DRDO ने ओडिशा के एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से एक इंटरसेप्टर मिसाइल लॉन्च की थी। इसका लक्ष्य लो-अर्थ ऑर्बिट में मौजूद Microsat-R सैटेलाइट था। इंटरसेप्टर ने सैटेलाइट को सीधे टक्कर मारकर नष्ट किया। इसे हिट-टू-किल तकनीक कहा जाता है, जिसमें विस्फोटक के बजाय तेज गति से सीधी टक्कर के जरिए लक्ष्य को नष्ट किया जाता है।

इस परीक्षण के बाद भारत उन देशों की सूची में शामिल हो गया जिनके पास प्रत्यक्ष-आरोहण ASAT क्षमता का प्रदर्शन करने की क्षमता है।

ASAT हथियार क्या होता है?

ASAT यानी Anti-Satellite Weapon ऐसी तकनीक या हथियार प्रणाली को कहा जाता है जिसका उद्देश्य किसी सैटेलाइट को निष्क्रिय या नष्ट करना हो। इसका एक प्रमुख तरीका काइनेटिक डायरेक्ट-एसेंट ASAT है।

इस प्रणाली में जमीन से लॉन्च की गई इंटरसेप्टर मिसाइल अंतरिक्ष में मौजूद लक्ष्य तक पहुंचती है और बेहद तेज गति से उससे टकराती है। टक्कर की ऊर्जा इतनी अधिक होती है कि सैटेलाइट के महत्वपूर्ण हिस्से नष्ट हो सकते हैं।

हालांकि सैटेलाइट को नष्ट करने के बाद पैदा होने वाला मलबा बड़ी चुनौती बन सकता है। पृथ्वी की कक्षा में घूम रहे मलबे के छोटे-छोटे टुकड़े भी दूसरे सैटेलाइट्स से टकराकर नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए ASAT परीक्षणों को लेकर अंतरिक्ष सुरक्षा और दीर्घकालिक मलबे की समस्या पर काफी चर्चा होती है।

मिशन शक्ति के बाद भारत ने क्या किया?

मिशन शक्ति भारत की ASAT क्षमता का महत्वपूर्ण प्रदर्शन था, लेकिन इसके बाद भारत ने इसी तरह के कई और विनाशकारी ASAT परीक्षण नहीं किए हैं। इसका एक कारण अंतरिक्ष मलबे को लेकर मौजूद चिंता भी बताई जाती है।

भारत की अंतरिक्ष रणनीति केवल सैटेलाइट को नष्ट करने की क्षमता तक सीमित नहीं है। भविष्य में अंतरिक्ष आधारित प्रणालियों की सुरक्षा, निगरानी और संभावित खतरों से बचाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

भारत ने मिशन शक्ति के जरिए यह क्षमता जरूर प्रदर्शित की कि जरूरत पड़ने पर लो-अर्थ ऑर्बिट में किसी लक्ष्य को इंटरसेप्ट करने की तकनीकी क्षमता उसके पास है। लेकिन किसी वास्तविक युद्ध की स्थिति में किसी दूसरे देश के सैटेलाइट को नष्ट करना एक अलग और कहीं अधिक जटिल रणनीतिक फैसला होगा।

अंतरिक्ष युद्ध में भारत की स्थिति क्या है?

भारत के पास 2019 के मिशन शक्ति के बाद प्रत्यक्ष-आरोहण ASAT क्षमता का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित प्रमाण मौजूद है। इसका अर्थ यह है कि भारत ने लो-अर्थ ऑर्बिट में किसी सैटेलाइट को इंटरसेप्टर से नष्ट करने की तकनीक का सफल प्रदर्शन किया है।

लेकिन इसे इस अर्थ में नहीं देखा जाना चाहिए कि भारत के पास अंतरिक्ष में मौजूद हर प्रकार के सैटेलाइट को नष्ट करने की असीमित क्षमता है। अलग-अलग कक्षाओं, आकार और प्रकार के अंतरिक्ष यानों के लिए अलग तकनीकी चुनौतियां होती हैं।

आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष सुरक्षा का महत्व और बढ़ सकता है। संचार, नेविगेशन, मौसम, निगरानी और रक्षा से जुड़े सैटेलाइट्स पर दुनिया की निर्भरता बढ़ने के साथ उनकी सुरक्षा भी राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही है।

भारत के लिए चुनौती अब केवल दुश्मन के सैटेलाइट को गिराने की क्षमता रखने की नहीं, बल्कि अपने अंतरिक्ष नेटवर्क को सुरक्षित रखने, संभावित हमलों की पहचान करने और अंतरिक्ष में जिम्मेदार तरीके से अपनी रणनीतिक क्षमता विकसित करने की भी है।

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