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Congress on Great Nicobar Project: ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर्यावरण के लिए विनाशकारी रेसिपी’ — जयराम रमेश का केंद्र पर बड़ा हमला, चीन नीति को बताया ‘4C’

नई दिल्ली | 20 मई, 2026 | Congress on Great Nicobar Project: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना (Mega Infrastructure Project) को लेकर राजनीतिक और पर्यावरणीय विवाद एक बार फिर गरमा गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश (Jairam Ramesh) ने बुधवार को मोदी सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए ‘ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना’ को एक बड़ी ‘पर्यावरणीय और मानवीय तबाही’ का नुस्खा करार दिया है।

इसके साथ ही, कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर चीन के सामने लगातार आत्मसमर्पण करने की ‘4C नीति’ (4C Policy) अपनाने का गंभीर आरोप लगाया है। जयराम रमेश ने दावा किया कि सरकार इस विनाशकारी परियोजना का विरोध करने वाले पर्यावरणविदों और नागरिकों को ‘चीन के प्रति नरम’ (Soft on China) दिखाकर उनका मुंह बंद करने के लिए एक झूठा प्रोपेगैंडा अभियान चला रही है।

क्या है मोदी सरकार की ‘4C नीति’? जयराम रमेश ने उठाए 4 बड़े सवाल

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक विस्तृत पोस्ट साझा करते हुए कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सरकार के रुख को पाखंड की पराकाष्ठा बताया। उन्होंने केंद्र सरकार की चीन नीति को “Continuing, Calibrated Capitulation to China” (चीन के सामने लगातार और नपी-तुली रणनीति के तहत घुटने टेकना) करार दिया और अपने दावों के समर्थन में चार बड़े तथ्य सामने रखे:

  1. गलवान पर क्लीन चिट का विवाद: जयराम रमेश ने कहा कि जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में देश के 20 जांबाज जवानों की शहादत के बाद प्रधानमंत्री ने चीन को ‘अस्पष्ट क्लीन चिट’ दी थी, जो हमारे शहीदों का अपमान था।

  2. पारंपरिक अधिकारों का नुकसान: उन्होंने आरोप लगाया कि चीन के साथ सैन्य वार्ताओं के दौरान मोदी सरकार ने लद्दाख के कई महत्वपूर्ण इलाकों में भारतीय सेना के पारंपरिक पेट्रोलिंग (गश्त) और स्थानीय चरवाहों के चरागाह अधिकारों को गंवा दिया है।

  3. रिकॉर्ड व्यापार घाटा (Trade Deficit): कांग्रेस नेता ने आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि वित्त वर्ष 2025-26 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा रिकॉर्ड 115 अरब डॉलर (USD 115 Billion) के पार पहुंच गया है, जिससे भारतीय घरेलू उद्योगों (विशेषकर MSMEs) को भारी नुकसान हो रहा है।

  4. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में चीन की भूमिका पर चुप्पी: जयराम रमेश ने वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के हालिया खुलासों का जिक्र करते हुए कहा कि मई 2025 में हुए भारत-पाकिस्तान सैन्य संघर्ष ‘ऑपरेशन सिंदूर’ (Operation Sindoor) के दौरान पाकिस्तान की सैन्य जवाबी कार्रवाई की पूरी प्लानिंग, मॉनिटरिंग और उसे क्रियान्वित करने में चीन की केंद्रीय भूमिका थी। इसके बावजूद प्रधानमंत्री ने इस मोर्चे पर कोई सख्त कदम नहीं उठाया।

“यह सामरिक नहीं, विशुद्ध व्यापारिक प्रोजेक्ट है, जो ‘मोदानी’ साम्राज्य का हिस्सा बनेगा”

केंद्र सरकार लगातार यह दलील देती आई है कि हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती दादागिरी को रोकने और भारत की सामरिक/सैन्य क्षमताओं (Strategic Capabilities) को मजबूत करने के लिए ग्रेट निकोबार में ट्रांसशिपमेंट पोर्ट का निर्माण बेहद जरूरी है।

इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने दावा किया:

“यह अकाट्य सत्य है कि भारत को आर्थिक और रणनीतिक मोर्चे पर चीन की चुनौतियों का सामना लगातार करना पड़ रहा है। लेकिन सरकार जिस ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को जबरन आगे बढ़ा रही है, वह पूरी तरह से एक कमर्शियल (व्यापारिक) प्रोजेक्ट है। इस प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट में सैन्य बुनियादी ढांचे (Military Infrastructure) का कोई हिस्सा शामिल ही नहीं है।”

कांग्रेस नेता ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को लिखे एक पत्र का हवाला देते हुए सुझाव दिया कि यदि सरकार वास्तव में देश की सुरक्षा को मजबूत करना चाहती है, तो अंडमान और निकोबार कमांड के अंतर्गत आने वाले ‘आईएनएस बाज़’ (INS Baaz) और अन्य मौजूदा सैन्य ठिकानों का विस्तार किया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि इन रक्षा विकल्पों को इसलिए नजरअंदाज किया जा रहा है क्योंकि यह पूरा प्रोजेक्ट अंततः “मोदानी” (Modani) बिजनेस एम्पायर के विशाल व्यापारिक साम्राज्य का हिस्सा बनने जा रहा है।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट विवाद 2026: पक्ष और विपक्ष

केंद्र सरकार की दलील (सामरिक पक्ष) कांग्रेस / पर्यावरणविदों के आरोप (विपक्ष)
हिंद महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना बेहद जरूरी है। यह एक विशुद्ध व्यापारिक उद्यम है, सैन्य बेस नहीं।
अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग के पास बड़ा ट्रांसशिपमेंट हब बनाना भारत के हित में है। लाखों दुर्लभ पेड़ों की कटाई और आदिवासी समुदायों का विस्थापन होगा।
देश की रणनीतिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए यह प्रोजेक्ट आवश्यक है। रक्षा के लिए ‘INS Baaz’ का विकल्प मौजूद है, इसे निजी कारोबारी लाभ के लिए थोपा जा रहा है।

72,000 करोड़ रुपये से अधिक की इस मेगा परियोजना को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच की यह जंग अब पूरी तरह से ‘पर्यावरण बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा’ की बहस में तब्दील हो चुकी है। कांग्रेस जहां इसे पर्यावरण और स्थानीय जनजातियों के अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा और क्रोनी कैपिटलिज्म (मित्रवादी पूंजीवाद) का उदाहरण बता रही है, वहीं सरकार इसे भारत की भविष्य की समुद्री कूटनीति के लिए मील का पत्थर मानती है। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि पर्यावरण की चिंताओं और विकास की प्राथमिकताओं के बीच संतुलन कैसे बनता है।

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आप इस अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक और सैन्य घटनाक्रम को गहराई से समझने के लिए Operation Sindoor Military Conflict Analysis वीडियो देख सकते हैं, जिसमें मई 2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष (ऑपरेशन सिंदूर) के दौरान पाकिस्तान की मदद करने में चीन की भूमिका का पूरा रक्षा विश्लेषण और जमीनी हकीकत दिखाई गई है।

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