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अरुणाचल में चीन से सैनिकों का आमना-सामना, कांग्रेस ने PM मोदी पर साधा निशाना

अरुणाचल प्रदेश में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हालिया आमना-सामना होने की खबरों ने सीमा सुरक्षा और भारत-चीन संबंधों को लेकर राजनीतिक बहस तेज कर दी है। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार को घेरते हुए आरोप लगाया है कि चीन के साथ सीमा पर सामने आ रही घटनाओं को लेकर सरकार की ओर से पर्याप्त प्रतिक्रिया नहीं दी जा रही है। पार्टी ने भारत की चीन नीति, व्यापार घाटे और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दे भी उठाए हैं।

कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक मीडिया रिपोर्ट साझा करते हुए सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए। इस रिपोर्ट में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर के हवाले से कहा गया था कि अरुणाचल प्रदेश में कई स्थानों पर चीनी सेना के साथ आमना-सामना हुआ है और कुछ जगहों पर स्थिति जारी है।

इसी बीच ITBP प्रमुख ने बल की तैयारियों को मजबूत करने के लिए शौर्य कमांडो यूनिट, ड्रोन प्लाटून, नए प्रशिक्षण कार्यक्रम और सीमा चौकियों पर भूमिगत सुरक्षा ढांचे के विकास की जानकारी भी दी। इन तैयारियों का उद्देश्य कठिन पहाड़ी क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की परिचालन क्षमता बढ़ाना और बदलते युद्ध के तरीकों के अनुरूप तैयारी करना है।

अरुणाचल प्रदेश में सैनिकों के आमना-सामना पर कांग्रेस के सवाल

जयराम रमेश ने अपने बयान में आरोप लगाया कि अरुणाचल प्रदेश में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के साथ हालिया आमना-सामना होने की खबरों पर प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार की ओर से स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। उन्होंने ITBP महानिदेशक के बयान का हवाला देते हुए कहा कि सीमा पर तैनात भारतीय जवान अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, लेकिन सरकार को भी इन घटनाक्रमों पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

कांग्रेस नेता के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र से आगे के कुछ सीमावर्ती इलाकों में गश्त और सैनिकों की गतिविधियों को लेकर चिंता बनी हुई है। उन्होंने दावा किया कि तक्सिंग में आमना-सामना होने के बाद पिछले महीने वाचा और दमई में कोर कमांडर स्तर की बातचीत हुई थी।

रमेश ने स्थानीय लोगों की ओर से गश्त बिंदुओं को लेकर चिंता जताए जाने का भी उल्लेख किया। उन्होंने इन घटनाओं की तुलना लद्दाख में पहले सामने आए सीमा विवाद से की। हालांकि, गश्त बिंदुओं पर नियंत्रण या किसी क्षेत्र के खोने से जुड़े इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

कांग्रेस ने इस पूरे मामले को भारत की चीन नीति से जोड़ते हुए सरकार से जवाब मांगा है। दूसरी ओर, उपलब्ध समाचार विवरण में इन ताजा आरोपों पर केंद्र सरकार या भारतीय जनता पार्टी की तत्काल प्रतिक्रिया का उल्लेख नहीं है।

चीन नीति और प्रधानमंत्री मोदी पर जयराम रमेश का हमला

जयराम रमेश ने चीन के साथ भारत के संबंधों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि चीन के प्रति सरकार का रवैया भारतीय सुरक्षा हितों और आर्थिक हितों के लिहाज से सवालों के घेरे में है।

कांग्रेस नेता ने 19 जून 2020 को प्रधानमंत्री के उस बयान का भी जिक्र किया, जो गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक संघर्ष के बाद आया था। उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय दिए गए बयान से चीन को लेकर सरकार के रुख पर सवाल खड़े हुए थे।

गौरतलब है कि जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। इस घटना में भारत के 20 सैनिकों की जान गई थी। चीन ने बाद में अपने चार सैनिकों की मौत स्वीकार की थी।

रमेश ने पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे से जुड़ी रिपोर्टों का हवाला देते हुए यह भी सवाल उठाया कि लद्दाख में चीनी घुसपैठ की परिस्थितियों के दौरान सैन्य नेतृत्व को किस तरह के निर्देश दिए गए थे। उन्होंने पूर्व सेना प्रमुख के हवाले से कथित तौर पर दिए गए निर्देशों का उल्लेख किया, लेकिन इन दावों का पूरा संदर्भ और आधिकारिक पुष्टि अलग से देखना जरूरी है।

चीन के साथ सीमा विवाद लंबे समय से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति का महत्वपूर्ण विषय रहा है। इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच पहले भी मतभेद सामने आते रहे हैं। कांग्रेस जहां सरकार की रणनीति पर सवाल उठाती रही है, वहीं भाजपा अतीत में विपक्ष पर सेना के मनोबल को प्रभावित करने वाले बयान देने का आरोप लगा चुकी है।

चीन के साथ व्यापार घाटे को लेकर भी कांग्रेस ने उठाए सवाल

कांग्रेस ने सीमा सुरक्षा के अलावा भारत और चीन के बीच व्यापार को लेकर भी केंद्र सरकार की आलोचना की है। जयराम रमेश ने दावा किया कि वित्त वर्ष 2025-26 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़कर रिकॉर्ड 112 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष में यह करीब 99 अरब डॉलर था।

व्यापार घाटा उस स्थिति को कहा जाता है, जब किसी देश का आयात उसके निर्यात से अधिक होता है। चीन के साथ भारत के व्यापार में लंबे समय से आयात का हिस्सा अधिक रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, औद्योगिक उपकरण और विभिन्न विनिर्माण क्षेत्रों में चीनी उत्पादों की मौजूदगी इस व्यापार संबंध का महत्वपूर्ण पहलू है।

रमेश ने कहा कि चीन से बढ़ते आयात का असर भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) पर पड़ रहा है। उन्होंने सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की कोशिशों के बावजूद कई क्षेत्रों में चीनी आयात पर निर्भरता बनी हुई है।

कांग्रेस का तर्क है कि व्यापार घाटे को केवल आर्थिक आंकड़े के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे औद्योगिक क्षमता और आर्थिक सुरक्षा के संदर्भ में भी समझना चाहिए। हालांकि, व्यापार घाटे के वास्तविक प्रभाव का आकलन करने के लिए विभिन्न उद्योगों के आयात, निर्यात, घरेलू उत्पादन और मूल्य प्रतिस्पर्धा के आंकड़ों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

ITBP की नई शौर्य कमांडो यूनिट क्या है?

भारत-चीन सीमा पर सुरक्षा तैयारियों के बीच ITBP ने शौर्य कमांडो यूनिट विकसित की है। महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर के अनुसार, बल ने इस यूनिट के माध्यम से अपनी परिचालन क्षमता बढ़ाने की दिशा में काम किया है। अरुणाचल प्रदेश में चीनी सैनिकों के साथ आमना-सामना होने वाली परिस्थितियों में इस टीम के प्रदर्शन का भी उन्होंने उल्लेख किया।

कपूर ने बताया कि प्रत्येक सीमा सुरक्षा बटालियन में शौर्य कमांडो टीम तैयार करने की योजना है। इसके अलावा, इस विशेष इकाई का विस्तार कर भविष्य में एक पूर्ण बटालियन बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है। इस बटालियन को ऊंचाई वाले क्षेत्रों में विशेष अभियानों के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा।

ITBP प्रमुख के अनुसार, बल एक ऐसी विशेष पर्वतीय युद्ध क्षमता विकसित करना चाहता है, जो कठिन ऊंचाई वाले इलाकों में प्रभावी ढंग से काम कर सके और भारतीय सेना की भूमिका से अलग विशिष्ट जिम्मेदारियां निभाए।

शौर्य कमांडो के विस्तार का उद्देश्य सीमा पर तैनात जवानों को अधिक विशेष प्रशिक्षण देना और अचानक पैदा होने वाली परिस्थितियों से निपटने की तैयारी को मजबूत करना है। हालांकि, यूनिट की संख्या, तैनाती और उसकी परिचालन क्षमताओं से संबंधित विवरणों को आधिकारिक जानकारी के आधार पर ही समझना चाहिए।

गलवान जैसी स्थिति से निपटने के लिए ITBP का नया प्रशिक्षण

ITBP ने जवानों को कठिन परिस्थितियों के लिए तैयार करने के उद्देश्य से ‘स्ट्राइक’ नाम का नया प्रशिक्षण पाठ्यक्रम भी तैयार किया है। ITBP महानिदेशक के मुताबिक, इस पाठ्यक्रम के जरिए जवानों को गलवान जैसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए बेहतर तरीके से प्रशिक्षित किया जाएगा।

जून 2020 की गलवान घाटी की हिंसक झड़प में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हाथापाई और पारंपरिक हथियारों के इस्तेमाल की खबरें सामने आई थीं। इस घटना ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गश्त, सैनिकों की तैयारी और सीमा प्रबंधन के तरीकों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

ITBP प्रमुख ने कहा कि बल के सभी जवानों को चरणबद्ध तरीके से नए प्रशिक्षण से जोड़ा जाएगा और 2027 के अंत तक पूरे बल को इस प्रशिक्षण के दायरे में लाने का लक्ष्य है।

इस तरह के प्रशिक्षण का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि भारत-चीन सीमा के कई हिस्से ऊंचे पहाड़ों, दुर्गम रास्तों और प्रतिकूल मौसम वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। ऐसी परिस्थितियों में जवानों को केवल पारंपरिक सुरक्षा प्रक्रियाओं ही नहीं, बल्कि विशेष पर्वतीय संचालन और बदलती परिस्थितियों के अनुसार भी तैयार रहना पड़ता है।

सीमा चौकियों पर भूमिगत सुरक्षा ढांचा बनाने की योजना

ITBP अपनी सीमा चौकियों पर भूमिगत ढांचे तैयार करने की दिशा में भी काम कर रही है। शत्रुजीत सिंह कपूर के अनुसार, आधुनिक युद्ध में खुले स्थान पर मौजूद जवानों और ठिकानों को निशाना बनाए जाने का जोखिम बढ़ गया है। ऐसे में भूमिगत आश्रय और सुरक्षित ढांचे सैनिकों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

उन्होंने बताया कि पायलट परियोजना के तहत विभिन्न कंपनियों ने अपनी सीमा चौकियों यानी बॉर्डर आउटपोस्ट (BOP) पर भूमिगत संरचनाएं बनाना शुरू किया है। इस पहल का उद्देश्य जवानों को संभावित संघर्ष की स्थिति में अधिक सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराना है।

भूमिगत ढांचे कठिन मौसम में भी उपयोगी हो सकते हैं, हालांकि उनका वास्तविक लाभ निर्माण की गुणवत्ता, स्थानीय भूगोल, संचार व्यवस्था और परिचालन जरूरतों पर निर्भर करेगा। ITBP की योजना को बल के व्यापक आधुनिकीकरण प्रयासों के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।

इसके साथ ही पुराने हथियारों को बदलने और सुरक्षा उपकरणों को आधुनिक बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है। ITBP प्रमुख ने कहा कि कई जवान लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे हथियारों के साथ काम कर रहे हैं और अब आधुनिकीकरण की जरूरत बढ़ गई है।

ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम पर ITBP का जोर

सीमा सुरक्षा में ड्रोन तकनीक की बढ़ती भूमिका को देखते हुए ITBP ने सभी सीमा सुरक्षा बटालियनों में ड्रोन प्लाटून बनाने की जानकारी दी है। बल ड्रोन पायलटों को प्रशिक्षण दे रहा है और अपने स्तर पर ड्रोन तैयार करने की दिशा में भी काम कर रहा है।

कपूर के मुताबिक, ITBP ने 400 करोड़ रुपये के आधुनिकीकरण फंड का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा ड्रोन से संबंधित क्षमताओं पर खर्च करने का प्रावधान किया है। उन्होंने यह भी बताया कि 3,500 से 4,000 करोड़ रुपये की एक अन्य आधुनिकीकरण योजना में ड्रोन के लिए 1,000 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं।

ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी, दुर्गम क्षेत्रों की जानकारी जुटाने और सीमा पर गतिविधियों पर नजर रखने में किया जा सकता है। दूसरी ओर, एंटी-ड्रोन प्रणाली का उद्देश्य अनधिकृत या संभावित रूप से खतरनाक ड्रोन गतिविधियों का मुकाबला करना है।

ITBP की योजना यह संकेत देती है कि बल पारंपरिक गश्त और सुरक्षा व्यवस्थाओं के साथ नई तकनीकों को भी शामिल करना चाहता है। हालांकि, इन योजनाओं के प्रभाव का आकलन उनके क्रियान्वयन, उपलब्ध उपकरणों और प्रशिक्षण की गुणवत्ता के आधार पर किया जा सकेगा।

भारत-चीन सीमा पर सुरक्षा तैयारियां क्यों हैं महत्वपूर्ण?

भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा लगभग 3,488 किलोमीटर लंबी है, जिसकी निगरानी में ITBP की महत्वपूर्ण भूमिका है। सीमा के कई हिस्से बेहद कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में आते हैं, जहां निगरानी, संचार और त्वरित प्रतिक्रिया के लिए विशेष तैयारी की जरूरत होती है।

अरुणाचल प्रदेश में हालिया आमना-सामना होने की खबरों और ITBP की नई तैयारियों ने एक बार फिर सीमा सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित किया है। एक ओर कांग्रेस ने सरकार की चीन नीति और सीमा प्रबंधन पर सवाल उठाए हैं, वहीं दूसरी ओर ITBP ने प्रशिक्षण, शौर्य कमांडो, भूमिगत ढांचे और ड्रोन क्षमता को मजबूत करने की योजनाएं सामने रखी हैं।

कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ भारत-चीन संबंधों पर जारी राजनीतिक बहस को भी रेखांकित करता है। सीमा पर हुई घटनाओं, गश्त बिंदुओं से जुड़े दावों और राजनीतिक आरोपों की पुष्टि आधिकारिक जानकारी तथा स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्यों के आधार पर करना आवश्यक है।

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