
परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े विधेयकों को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक खींचतान एक बार फिर तेज हो गई है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू की ओर से विपक्षी दलों के साथ बातचीत किए जाने और संसद का छोटा सत्र बुलाए जाने की संभावनाओं के बीच कांग्रेस ने सरकार से सर्वदलीय बैठक की मांग दोहराई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा है कि परिसीमन जैसे संवेदनशील संवैधानिक विषय पर सभी दलों से चर्चा होनी चाहिए। वहीं, सरकार का कहना है कि उसने पहले ही कई विपक्षी दलों से संपर्क किया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इस मुद्दे पर विपक्षी दलों की एकजुटता कायम रहेगी या अलग-अलग दल अपने राजनीतिक हितों के अनुसार रुख अपनाएंगे।
परिसीमन विधेयक को लेकर क्यों बढ़ी राजनीतिक हलचल?
परिसीमन का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है। परिसीमन का अर्थ लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है। इसका सीधा संबंध इस बात से होता है कि अलग-अलग क्षेत्रों और राज्यों को संसद तथा विधानसभाओं में कितना प्रतिनिधित्व मिलता है।
केंद्र सरकार ने अप्रैल 2026 में लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पेश किया था। इसमें लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या बढ़ाकर 850 करने और महिला आरक्षण को 2029 के चुनावों से लागू करने की दिशा में बदलाव प्रस्तावित किए गए थे।
हालांकि, 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में यह विधेयक आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका। मतदान में 298 सांसदों ने विधेयक के पक्ष में और 230 ने विरोध में वोट दिया। विधेयक को पारित कराने के लिए कम से कम 352 मतों की आवश्यकता थी।
विधेयक के पारित नहीं होने के बाद अब इसके नए स्वरूप या संभावित संशोधित प्रस्ताव को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सरकार की ओर से विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ बातचीत किए जाने और संसद की अगली कार्यवाही को लेकर दिए गए संकेतों ने इस बहस को फिर तेज कर दिया है।
क्या संसद का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है?
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के हालिया बयानों के बाद संसद के छोटे या विशेष सत्र की संभावना को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि, अभी किसी नए सत्र की तारीख या विधेयक को दोबारा पेश किए जाने की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
सरकार की रणनीति को लेकर विपक्ष में चिंता है कि यदि नया प्रस्ताव संसद में लाया जाता है, तो उसे पारित कराने के लिए फिर से दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। ऐसे में सरकार विभिन्न राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर सकती है।
लेकिन इस राजनीतिक घटनाक्रम को कांग्रेस को अलग-थलग करने की निश्चित रणनीति मानना अभी जल्दबाजी होगी। सरकार ने विपक्षी दलों से बातचीत किए जाने की बात कही है, जबकि कांग्रेस का जोर सभी दलों की सामूहिक बैठक पर है। दोनों पक्षों के बीच मतभेद मुख्य रूप से परामर्श की प्रक्रिया और प्रस्ताव की स्पष्टता को लेकर दिखाई दे रहे हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने पीएम मोदी को चौथी बार लिखा पत्र
कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने 16 अक्टूबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर परिसीमन के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग दोहराई। यह इस विषय पर प्रधानमंत्री को लिखा गया उनका चौथा पत्र था।
खरगे ने अपने पत्र में कहा कि परिसीमन जैसे संवैधानिक बदलाव का असर देश के संसदीय क्षेत्रों, राज्यों के प्रतिनिधित्व और राजनीतिक व्यवस्था पर पड़ सकता है। इसलिए किसी भी नए प्रस्ताव को अंतिम रूप देने से पहले सभी राजनीतिक दलों और संबंधित पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए।
उन्होंने याद दिलाया कि इस मुद्दे पर उन्होंने पहली बार 11 अप्रैल 2026 को सर्वदलीय बैठक की मांग की थी। उनके अनुसार, 14 अप्रैल की देर शाम विधेयक सार्वजनिक किए गए और इसके बाद संसद का विशेष सत्र बुलाया गया।
खरगे ने 16 जुलाई और 27 अगस्त को भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर चर्चा की मांग की थी। अब उन्होंने फिर कहा है कि सरकार को नए विधेयक पर एकतरफा आगे बढ़ने के बजाय व्यापक सहमति बनाने का प्रयास करना चाहिए।
कांग्रेस की चिंता केवल विधेयक के पारित होने तक सीमित नहीं है। पार्टी यह भी जानना चाहती है कि सरकार परिसीमन के लिए कौन-सा नया फॉर्मूला अपनाने पर विचार कर रही है और उसका राज्यों के प्रतिनिधित्व पर क्या असर पड़ेगा।
खरगे के पत्र पर किरेन रिजिजू का जवाब
मल्लिकार्जुन खरगे की मांग पर केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने जवाब देते हुए कहा कि सरकार ने विपक्ष के साथ बातचीत करने के कई प्रयास किए हैं। उनके अनुसार, कांग्रेस को चर्चा के लिए समय देने का अनुरोध किया गया था, लेकिन तारीख तय नहीं होने के बाद सरकार ने दूसरे राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से संपर्क किया।
रिजिजू ने बताया कि परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों पर समाजवादी पार्टी (SP), द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK), वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार गुट, शिवसेना (UBT), एआईएमआईएम और बीजू जनता दल (BJD) सहित विभिन्न दलों के प्रतिनिधियों से बातचीत की गई। सरकार का कहना है कि इन चर्चाओं का उद्देश्य व्यापक सहमति बनाने की संभावनाएं तलाशना था।
रिजिजू ने यह भी कहा कि विपक्षी दलों को विधेयक पर रचनात्मक तरीके से सहयोग करना चाहिए। सरकार के मुताबिक, केवल सर्वदलीय बैठक की मांग दोहराने के बजाय पहले से किए गए संवाद में भी भागीदारी होनी चाहिए।
हालांकि, कांग्रेस ने इस घटनाक्रम के बाद नए प्रस्ताव की स्पष्ट जानकारी मांगी है। पार्टी की ओर से यह सवाल भी उठाया गया कि क्या सरकार के पास वास्तव में कोई नया और ठोस परिसीमन प्रस्ताव है या अप्रैल में पराजित हुए विधेयक को ही दोबारा लाने की तैयारी है।
संसद का सत्रावसान नहीं होने पर क्या है विवाद?
खरगे ने अपने पत्र में मानसून सत्र के बाद संसद का सत्रावसान नहीं किए जाने पर भी सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा कि 13 अगस्त 2026 को लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद भी 64 दिन बीत चुके थे, लेकिन दोनों सदनों का औपचारिक सत्रावसान नहीं हुआ था।
इस पर रिजिजू ने स्पष्ट किया कि संविधान में ऐसा कोई निश्चित समय निर्धारित नहीं है, जिसके भीतर अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए गए सदन का सत्रावसान करना अनिवार्य हो। उन्होंने कहा कि केवल सत्रावसान में देरी होने से अपने आप कोई संवैधानिक या प्रक्रियात्मक अनियमितता नहीं बनती।
यहां दो संसदीय प्रक्रियाओं के बीच अंतर समझना जरूरी है। जब सदन की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होती है, तो उस सत्र की अगली बैठक की तारीख तय नहीं रहती। वहीं, सत्रावसान राष्ट्रपति के आदेश से होता है और उससे संसद के संबंधित सत्र का औपचारिक समापन होता है।
सत्रावसान न होने का मतलब यह नहीं है कि सरकार ने नया सत्र बुलाने का फैसला कर लिया है। लेकिन इससे अगली संसदीय कार्यवाही की तैयारी को लेकर राजनीतिक अटकलें जरूर लगाई जा रही हैं।
महिला आरक्षण विधेयक में क्या है प्रस्ताव?
इस पूरे विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू महिला आरक्षण भी है। संसद ने 2023 में महिलाओं के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान करने वाला कानून पारित किया था। इसके लागू होने का संबंध जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ा गया था।
अप्रैल 2026 में पेश किए गए संविधान संशोधन विधेयक का उद्देश्य महिला आरक्षण को 2029 के चुनावों से लागू करने का रास्ता तैयार करना और लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या बढ़ाकर 850 करना था। लेकिन यह विधेयक आवश्यक बहुमत नहीं जुटा पाया।
महिला आरक्षण को लेकर राजनीतिक दलों के सामने एक जटिल स्थिति है। एक ओर महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने का मुद्दा है, तो दूसरी ओर परिसीमन के आधार, सीटों के वितरण और राज्यों के प्रतिनिधित्व पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर सवाल हैं।
इसलिए विधेयक के समर्थन या विरोध को केवल महिला आरक्षण के पक्ष या विपक्ष के रूप में देखना पूरे विवाद को नहीं समझाता। इसके अलग-अलग प्रावधानों और उनके संभावित परिणामों पर चर्चा जरूरी है।
परिसीमन पर क्षेत्रीय दलों की भूमिका क्यों अहम?
संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए लोकसभा में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है। अप्रैल में हुई वोटिंग के नतीजों से स्पष्ट हुआ कि केवल सत्तारूढ़ गठबंधन का समर्थन पर्याप्त नहीं था।
ऐसे में क्षेत्रीय दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। अलग-अलग राज्यों की पार्टियां परिसीमन को अपने राज्य की जनसंख्या, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भविष्य में मिलने वाली संसदीय सीटों के संदर्भ में देखती हैं।
सरकार की ओर से विभिन्न दलों से संपर्क किए जाने के पीछे विधेयक पर समर्थन और सहमति जुटाने का प्रयास बताया गया है। हालांकि, किसी दल से बातचीत होने का अर्थ यह नहीं है कि उसने विधेयक का समर्थन करने का निर्णय ले लिया है।
कांग्रेस के लिए भी यह जरूरी है कि वह परिसीमन के प्रस्ताव पर अपने सहयोगी दलों के रुख को समझे। विपक्षी गठबंधन में शामिल सभी दलों के हित और प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। ऐसे में SIR के मुद्दे पर साथ दिखाई देने वाले दल परिसीमन पर अलग-अलग राय रख सकते हैं।
SIR के मुद्दे पर एकजुट विपक्ष के सामने नई चुनौती?
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्षी दलों ने चुनावी प्रक्रिया और मतदाता अधिकारों से जुड़े सवाल उठाए हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस सहित कई दलों ने विरोध दर्ज कराया है। लेकिन परिसीमन और महिला आरक्षण का विषय अलग संवैधानिक तथा राजनीतिक प्रश्न खड़े करता है।
DMK, समाजवादी पार्टी और अन्य क्षेत्रीय दलों के लिए परिसीमन पर अपने राज्य के हितों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है। वहीं, कांग्रेस व्यापक विपक्षी एकजुटता बनाए रखते हुए सरकार से सामूहिक चर्चा की मांग कर रही है।
इसलिए यह कहना अभी सही नहीं होगा कि परिसीमन के मुद्दे पर विपक्षी गठबंधन टूट जाएगा या कांग्रेस पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाएगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत के तरीके, विधेयक के स्वरूप और राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर मतभेद बने हुए हैं।
आगे क्या होगा? नए प्रस्ताव पर टिकी निगाहें
परिसीमन विधेयक पर आगे की स्थिति काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार कोई नया प्रस्ताव सामने लाती है या नहीं। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि प्रस्ताव में राज्यों के प्रतिनिधित्व, लोकसभा की कुल सीटों और महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया के संबंध में क्या प्रावधान किए जाते हैं।
कांग्रेस ने सर्वदलीय बैठक की मांग दोहराई है, जबकि सरकार का कहना है कि वह कई राजनीतिक दलों से संवाद कर चुकी है। दोनों पक्षों के बीच आगे बातचीत होती है या नहीं, इससे विधेयक पर सहमति की संभावनाओं का अंदाजा लग सकता है।
फिलहाल संसद के नए सत्र की तारीख और परिसीमन विधेयक को दोबारा पेश करने को लेकर कोई अंतिम घोषणा नहीं हुई है। इसलिए इस मामले में राजनीतिक दावों और वास्तविक संसदीय फैसलों के बीच अंतर करना जरूरी है।
निष्कर्ष: परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़ा विवाद केवल कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक मुकाबला नहीं है। इसका संबंध संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व, महिला आरक्षण के क्रियान्वयन और संवैधानिक प्रक्रिया से भी है। आगे की दिशा इस बात से तय होगी कि सरकार प्रस्ताव को कितना स्पष्ट बनाती है और विभिन्न राजनीतिक दल उसके प्रावधानों पर किस तरह सहमति या असहमति जताते हैं।



