
भारत में आयोजित होने वाले ब्रिक्स संसदीय सम्मेलन के दौरान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला विदेशी प्रतिनिधिमंडलों के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकें करेंगे। इन बैठकों का उद्देश्य भारत और दूसरे देशों के बीच संसदीय सहयोग को मजबूत करना तथा वैश्विक मुद्दों पर संवाद के नए अवसर तैयार करना है। सम्मेलन में चीन, रूस, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), मिस्र और ब्राजील समेत कई देशों के संसदीय प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का मानना है कि मौजूदा दौर में जब दुनिया कई तरह की राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब संसदीय कूटनीति की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। संसदें केवल अपने देश में कानून बनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विचार-विमर्श और देशों के बीच आपसी समझ बढ़ाने में भी योगदान दे सकती हैं।
ब्रिक्स संसदीय फोरम की मेजबानी भारत कर रहा है। इस मंच पर वैश्विक चुनौतियों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), नई तकनीकों के मानव-केंद्रित इस्तेमाल और विभिन्न देशों के अनुभव साझा करने जैसे विषयों पर चर्चा होगी। सम्मेलन को भारत की संसदीय कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने के एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
ब्रिक्स संसदीय सम्मेलन में ओम बिरला की अहम भूमिका
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला सम्मेलन में शामिल होने के लिए नई दिल्ली पहुंचने वाले प्रत्येक विदेशी संसदीय प्रतिनिधिमंडल के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय बैठक करेंगे। इन मुलाकातों के जरिए भारत विभिन्न देशों के संसदीय नेतृत्व के साथ सीधे संवाद को बढ़ावा देना चाहता है।
द्विपक्षीय बैठकों में आमतौर पर दोनों पक्षों के बीच सहयोग के संभावित क्षेत्रों, संसदीय प्रक्रियाओं, लोकतांत्रिक संस्थाओं के अनुभव और आपसी संबंधों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की जाती है। ब्रिक्स सम्मेलन के संदर्भ में ऐसी मुलाकातें सदस्य देशों के बीच संपर्क मजबूत करने का अवसर प्रदान कर सकती हैं।
ओम बिरला ने संसदीय कूटनीति के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि वैश्विक अस्थिरता के दौर में देशों के बीच संवाद बनाए रखना जरूरी है। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों पर केवल सरकारों के स्तर पर ही नहीं, बल्कि संबंधित देशों की संसदों के भीतर भी चर्चा होनी चाहिए।
इस पहल का एक प्रमुख उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और उनसे जुड़े महत्वपूर्ण विषय अलग-अलग देशों के संसदीय विमर्श का हिस्सा बनें। इससे विभिन्न देशों के जनप्रतिनिधियों को वैश्विक मुद्दों पर अपने विचार रखने और दूसरे देशों के दृष्टिकोण को समझने का अवसर मिल सकता है।
वैश्विक अस्थिरता के बीच क्यों महत्वपूर्ण है संसदीय कूटनीति?
दुनिया में बदलते भू-राजनीतिक हालात, क्षेत्रीय संघर्ष, आर्थिक अनिश्चितता और तकनीकी बदलाव देशों के सामने नई चुनौतियां पेश कर रहे हैं। ऐसे माहौल में अंतरराष्ट्रीय संवाद और सहयोग की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है।
संसदीय कूटनीति इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसके तहत विभिन्न देशों की संसदों के अध्यक्ष, सांसद और संसदीय प्रतिनिधि एक-दूसरे से बातचीत करते हैं। इस तरह के संवाद से नीतिगत अनुभव साझा करने, अलग-अलग दृष्टिकोण समझने और सहयोग के नए रास्ते तलाशने में मदद मिल सकती है।
ओम बिरला ने संकेत दिया है कि भारत वैश्विक अस्थिरता से जुड़े मुद्दों पर देशों के बीच चर्चा को प्रोत्साहित करना चाहता है। इसके साथ ही इन विषयों पर संबंधित देशों के भीतर संसदीय बहस को बढ़ावा देना भी इस पहल का हिस्सा है।
संसदों की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि सांसद अपने-अपने देशों के नागरिकों और विभिन्न क्षेत्रों की चिंताओं को व्यापक विमर्श में सामने ला सकते हैं। हालांकि, संसदीय संवाद अपने आप में किसी अंतरराष्ट्रीय विवाद के समाधान की गारंटी नहीं देता, लेकिन यह आपसी समझ और संपर्क बढ़ाने में योगदान दे सकता है।
भारत दूसरे देशों के संसदीय दलों को भी करेगा आमंत्रित
ब्रिक्स संसदीय सम्मेलन के दौरान होने वाली बैठकों के अलावा भारत भविष्य में भी दूसरे देशों के साथ संसदीय संबंध मजबूत करने की योजना पर काम कर रहा है।
ओम बिरला के अनुसार, आने वाले समय में कई देशों के संसदीय प्रतिनिधिमंडलों को भारत आमंत्रित किया जाएगा। इसके साथ ही भारत की ओर से भी संसदीय दलों को अधिक देशों में भेजने की मंशा है।
इस तरह के आदान-प्रदान से विभिन्न देशों के सांसदों को एक-दूसरे की संसदीय व्यवस्थाओं, विधायी प्रक्रियाओं और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज को समझने का अवसर मिलता है। इसके अतिरिक्त, शिक्षा, प्रौद्योगिकी, आर्थिक सहयोग और वैश्विक चुनौतियों जैसे विषयों पर भी विचार साझा किए जा सकते हैं।
भारत की इस पहल का उद्देश्य संसदीय स्तर पर संवाद को केवल किसी एक सम्मेलन तक सीमित न रखना, बल्कि उसे लगातार आगे बढ़ाना है। विदेशी संसदीय दलों की भारत यात्रा और भारतीय प्रतिनिधिमंडलों के दूसरे देशों में जाने से संपर्क के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
ब्रिक्स संसदीय फोरम में AI और तकनीक पर होगी चर्चा
ब्रिक्स संसदीय फोरम के एजेंडे में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्रौद्योगिकी के उचित तथा मानव-केंद्रित इस्तेमाल को प्रमुख स्थान दिया गया है। तेजी से विकसित हो रही तकनीकों ने शासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और नागरिक सेवाओं के क्षेत्र में नए अवसर पैदा किए हैं। इसके साथ ही डेटा सुरक्षा, गोपनीयता, जवाबदेही और तकनीक तक समान पहुंच जैसे विषय भी महत्वपूर्ण हो गए हैं।
सम्मेलन में इन मुद्दों पर चर्चा के जरिए यह समझने का अवसर मिलेगा कि विभिन्न देश नई तकनीकों का उपयोग किस तरह कर रहे हैं और उनके सामने कौन-सी चुनौतियां हैं।
मानव-केंद्रित तकनीक का विचार इस बात पर जोर देता है कि तकनीकी विकास का लाभ लोगों तक पहुंचे और उसका इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ किया जाए। संसदीय स्तर पर इस विषय पर बातचीत भविष्य में नीतियों और नियामकीय व्यवस्थाओं से संबंधित अनुभव साझा करने में उपयोगी हो सकती है।
इसके अलावा, सम्मेलन में सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान और क्षमता निर्माण पर भी चर्चा होनी है। इसका अर्थ है कि अलग-अलग देशों के सफल अनुभवों से सीखने और संस्थागत क्षमताओं को मजबूत करने के तरीकों पर विचार किया जाएगा।
चीन, रूस और ईरान समेत कई देशों के प्रतिनिधि होंगे शामिल
भारत में आयोजित ब्रिक्स संसदीय फोरम में कई देशों के वरिष्ठ संसदीय प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। प्रतिनिधिमंडलों में संसदों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सांसद और संसदीय समितियों से जुड़े वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हैं।
ईरान की ओर से संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ चार सांसदों के साथ सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं। रूस के स्टेट ड्यूमा के अध्यक्ष व्याचेस्लाव वोलोडिन 10 सांसदों के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं।
चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस की स्थायी समिति के उपाध्यक्ष झेंग जियानबांग तीन सांसदों के साथ भाग ले रहे हैं। वहीं, संयुक्त अरब अमीरात की फेडरल नेशनल काउंसिल के अध्यक्ष साकर घोबाश तीन सांसदों के साथ सम्मेलन में शामिल हैं।
मिस्र की ओर से विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष सामेह शौकरी दो सांसदों के साथ प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ब्राजील की तरफ से ब्रिक्स संबंधों के लिए उसके संसदीय समूह के अध्यक्ष सीनेटर इराजा सिल्वेस्ट्रे फिल्हो भाग ले रहे हैं।
इन देशों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों की भागीदारी सम्मेलन को व्यापक अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देती है। साथ ही, यह विभिन्न राष्ट्रीय संसदीय संस्थाओं के बीच संवाद और अनुभव साझा करने के लिए एक मंच उपलब्ध कराती है।
ब्रिक्स देशों के बीच संसदीय सहयोग का क्या है महत्व?
ब्रिक्स एक अंतरराष्ट्रीय समूह है, जिसके सदस्य देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और अन्य क्षेत्रों में सहयोग को लेकर संवाद होता है। संसदीय फोरम इस व्यापक सहयोग में जनप्रतिनिधियों और विधायी संस्थाओं को अपनी बात रखने का अवसर देता है।
संसदीय सहयोग का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें विभिन्न देशों के प्रतिनिधि कानून निर्माण, संस्थागत प्रक्रियाओं और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े अपने अनुभव साझा कर सकते हैं। इससे एक-दूसरे की व्यवस्थाओं को समझने और समान चुनौतियों पर चर्चा करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, अलग-अलग देशों के राजनीतिक और आर्थिक हित हमेशा समान नहीं होते। ऐसे में संसदीय कूटनीति का उद्देश्य सभी मतभेदों को तुरंत समाप्त करना नहीं, बल्कि संवाद के माध्यम से समझ बढ़ाना और सहयोग की संभावनाएं तलाशना है।
भारत की मेजबानी में हो रहा यह सम्मेलन इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। ओम बिरला की प्रस्तावित द्विपक्षीय बैठकें विदेशी प्रतिनिधिमंडलों के साथ सीधे संपर्क को बढ़ाने का अवसर देंगी, जबकि फोरम की चर्चाएं वैश्विक चुनौतियों और तकनीकी बदलावों पर साझा दृष्टिकोण विकसित करने में सहायक हो सकती हैं।
भारत की संसदीय कूटनीति को मिलेगा नया अवसर
ब्रिक्स संसदीय सम्मेलन भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय संसदीय संबंधों को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण मंच है। विदेशी प्रतिनिधिमंडलों के साथ अलग-अलग बैठकें करने और भविष्य में अधिक संसदीय दलों को आमंत्रित करने की योजना से स्पष्ट होता है कि भारत इस स्तर पर संवाद का विस्तार करना चाहता है।
वैश्विक अस्थिरता, तकनीकी विकास और बदलते अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बीच संसदों के बीच संपर्क बढ़ाना उपयोगी साबित हो सकता है। इससे विभिन्न देशों के जनप्रतिनिधियों को विचार साझा करने, एक-दूसरे की प्राथमिकताओं को समझने और सहयोग के संभावित क्षेत्रों पर चर्चा करने का अवसर मिलेगा।
कुल मिलाकर, ओम बिरला की द्विपक्षीय बैठकों और ब्रिक्स संसदीय फोरम का मुख्य फोकस संसदीय सहयोग को मजबूत करना, वैश्विक मुद्दों पर संवाद बढ़ाना और AI तथा प्रौद्योगिकी के जिम्मेदार इस्तेमाल जैसे विषयों पर अनुभव साझा करना है। सम्मेलन से निकलने वाले विचार और आगे होने वाले संसदीय आदान-प्रदान भारत के अंतरराष्ट्रीय संसदीय संपर्कों को नई दिशा दे सकते हैं।



