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Ram Mandir Trust RTI Case: CIC ने गोपनीयता और सुरक्षा कारणों से जानकारी रोकने को सही ठहराया

Ram Mandir Trust RTI Case: श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े दस्तावेजों को सार्वजनिक सूचना अधिकार (RTI) के तहत साझा न करने के केंद्र सरकार के फैसले पर बड़ा प्रशासनिक निर्णय सामने आया है। केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने अपने 2024 के आदेश में गृह मंत्रालय के इस रुख को सही ठहराया है कि इन दस्तावेजों को सार्वजनिक करना सुरक्षा और संवेदनशीलता के लिहाज से उचित नहीं होगा।

यह मामला Central Information Commission द्वारा सुने गए एक महत्वपूर्ण अपील से जुड़ा है, जिसमें Ministry of Home Affairs के निर्णय को चुनौती दी गई थी।


RTI आवेदन से शुरू हुआ पूरा मामला

इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब एक आरटीआई आवेदक नीरज शर्मा ने राम जन्मभूमि ट्रस्ट से जुड़े सरकारी आदेशों और अधिसूचनाओं की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं। उन्होंने विशेष रूप से 5 फरवरी 2020 को जारी उस अधिसूचना और संबंधित योजना की जानकारी मांगी थी, जिसके तहत केंद्र सरकार ने ट्रस्ट के गठन को मंजूरी दी थी।

इस अधिसूचना का संबंध उस ऐतिहासिक निर्णय से था, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट की स्थापना की गई थी।

हालांकि, मंत्रालय की ओर से उन्हें अपेक्षित जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई, जिसके बाद उन्होंने मामले को अपील के रूप में सूचना आयोग तक पहुंचाया।


गृह मंत्रालय की दलील: जानकारी संवेदनशील और गोपनीय

सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय ने आयोग के सामने यह स्पष्ट किया कि ट्रस्ट से जुड़े सभी दस्तावेज अत्यंत संवेदनशील श्रेणी में आते हैं। मंत्रालय ने कहा कि इन दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से संबंधित व्यक्तियों की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

मंत्रालय ने सूचना के अधिकार कानून की धारा 8(1)(g) का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी जानकारी का खुलासा करना सुरक्षित नहीं है, क्योंकि इससे किसी की जान को खतरा उत्पन्न हो सकता है।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रस्ट एक स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था है, जिसमें केंद्र या राज्य सरकार का कोई वित्तीय या प्रशासनिक नियंत्रण नहीं है। सरकार की भूमिका केवल सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ट्रस्ट के गठन तक सीमित थी।


ट्रस्ट की कानूनी स्थिति पर बहस

इस मामले में यह भी सवाल उठाया गया कि क्या श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को RTI कानून के तहत “सार्वजनिक प्राधिकरण” माना जा सकता है या नहीं।

ट्रस्ट की ओर से दलील दी गई कि इसे किसी सरकारी अधिसूचना के जरिए न तो स्थापित किया गया है और न ही इसे सरकारी फंडिंग मिलती है। इसलिए यह RTI कानून के दायरे में नहीं आता।

दूसरी ओर सरकार ने भी यही तर्क रखा कि ट्रस्ट पूरी तरह स्वतंत्र है और उस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है।


CIC का महत्वपूर्ण फैसला

तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त हीरालाल सामरिया ने मामले की सुनवाई के बाद कहा कि सूचना अधिकारी ने उचित जवाब दिया है और इस मामले में आगे किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

आयोग ने माना कि मांगी गई जानकारी की प्रकृति ऐसी है जिसे सार्वजनिक करने से सुरक्षा जोखिम पैदा हो सकता है। इसी आधार पर अपील को खारिज कर दिया गया।

एक अलग आदेश में आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रस्ट को RTI अधिनियम की धारा 2(एच) के तहत सार्वजनिक संस्था नहीं माना जा सकता।


सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बना ट्रस्ट

राम जन्मभूमि ट्रस्ट का गठन भारत के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के अनुपालन में किया गया था। यह निर्णय अयोध्या भूमि विवाद मामले के समाधान के बाद आया था, जिसमें मंदिर निर्माण के लिए एक स्वतंत्र ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया गया था।

सरकार का कहना है कि यह ट्रस्ट किसी सरकारी अधिसूचना से स्वतंत्र रूप से नहीं बना, बल्कि न्यायालय के निर्देशों के आधार पर स्थापित किया गया एक अलग संस्थान है।


RTI कानून और धारा 8(1)(g) का महत्व

इस पूरे मामले में RTI कानून की धारा 8(1)(g) सबसे अहम रही। इस प्रावधान के अनुसार, ऐसी जानकारी जिसे सार्वजनिक करने से किसी व्यक्ति की जान या सुरक्षा को खतरा हो, उसे उजागर नहीं किया जा सकता।

CIC ने भी माना कि इस मामले में यह प्रावधान लागू होता है, क्योंकि दस्तावेजों की प्रकृति संवेदनशील है।


पारदर्शिता बनाम सुरक्षा की बहस

यह मामला एक बार फिर भारत में पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन की बहस को सामने लाता है। एक तरफ RTI कानून नागरिकों को जानकारी का अधिकार देता है, वहीं दूसरी तरफ कुछ परिस्थितियों में सुरक्षा कारणों से जानकारी रोकने का प्रावधान भी मौजूद है।

CIC के इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया कि हर सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, खासकर जब उससे सुरक्षा जोखिम जुड़ा हो।


निष्कर्ष

राम जन्मभूमि ट्रस्ट से जुड़े RTI विवाद में CIC का फैसला यह दर्शाता है कि संवेदनशील मामलों में गोपनीयता और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाती है। गृह मंत्रालय की दलील को स्वीकार करते हुए आयोग ने साफ किया कि ट्रस्ट से जुड़े दस्तावेजों को सार्वजनिक करना उचित नहीं होगा।

यह निर्णय आने वाले समय में RTI से जुड़े ऐसे अन्य मामलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा सकता है, जहां राष्ट्रीय सुरक्षा और सूचना अधिकार के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा।

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