
Nathuram Godse RSS Connection: महात्मा गांधी की हत्या और नाथूराम गोडसे के संगठनात्मक संबंधों को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और ऐतिहासिक बहस होती रही है। अब यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। वीडी सावरकर के ग्रैंड-नेफ्यू (नाती के बेटे) सत्यकी सावरकर ने पुणे की अदालत में चल रहे मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि नाथूराम गोडसे और उनके भाई गोपाल गोडसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सक्रिय कार्यकर्ता थे। यह बयान 17 अगस्त 2026 को राहुल गांधी के खिलाफ चल रहे मानहानि मामले में जिरह के दौरान सामने आया।
सत्यकी सावरकर का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह खुद कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि की शिकायत करने वाले व्यक्ति हैं। मामला वीडी सावरकर को लेकर राहुल गांधी द्वारा की गई कथित टिप्पणियों से जुड़ा है। अब इसी मामले की सुनवाई के दौरान गोडसे और RSS के संबंधों पर सवाल-जवाब ने राजनीतिक बहस को फिर तेज कर दिया है।
कोर्ट में क्या बोले सत्यकी सावरकर?
पुणे की विशेष अदालत में राहुल गांधी के वकील मिलिंद पवार सत्यकी सावरकर से जिरह कर रहे थे। इसी दौरान उनसे पूछा गया कि क्या नाथूराम गोडसे और उनके भाई गोपाल गोडसे RSS के सक्रिय कार्यकर्ता थे।
सत्यकी सावरकर ने जवाब में कहा कि यह सही है कि उनके नाना गोपाल गोडसे और नाथूराम गोडसे RSS के सक्रिय कार्यकर्ता थे। उन्होंने यह भी कहा कि नाथूराम गोडसे का संबंध हिंदू महासभा से भी था।
यह बयान सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में इसकी खूब चर्चा हो रही है। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि अदालत में किसी गवाह द्वारा दिया गया बयान अपने आप में किसी व्यापक ऐतिहासिक विवाद का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं होता। गोडसे की संगठनात्मक संबद्धता को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक दावे और व्याख्याएं पहले से मौजूद रही हैं।
Rahul Gandhi के खिलाफ किस मामले में हो रही है सुनवाई?
सत्यकी सावरकर ने वर्ष 2023 में राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि की शिकायत दायर की थी। शिकायत का संबंध राहुल गांधी के लंदन में दिए गए एक भाषण से है, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर वीडी सावरकर की एक किताब के हवाले से एक घटना का जिक्र किया था।
सत्यकी सावरकर का आरोप है कि राहुल गांधी ने सावरकर के बारे में ऐसी बात कही, जिसे सावरकर ने अपनी किसी किताब में लिखा ही नहीं था। इसी आधार पर उन्होंने इसे मानहानिकारक बताते हुए अदालत का रुख किया।
मामले की सुनवाई के दौरान अब सत्यकी सावरकर से लगातार जिरह हो रही है और उनके पुराने बयानों, सावरकर के लेखन तथा ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़े कई सवाल अदालत में उठाए जा रहे हैं।
Godse और RSS को लेकर क्यों है इतना विवाद?
नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या की थी। इसके बाद उनके राजनीतिक और संगठनात्मक संबंधों को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है।
गोडसे का संबंध हिंदू महासभा से रहा था। वहीं, उनके RSS से संबंध को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं। गोडसे ने अपने मुकदमे के दौरान यह कहा था कि वह RSS छोड़कर हिंदू महासभा में शामिल हुए थे और हिंदुओं के कथित अधिकारों के लिए काम करना चाहते थे।
यही दावा बाद के दशकों में RSS और गोडसे के संबंधों पर होने वाली बहस का एक प्रमुख हिस्सा बना। दूसरी ओर, कुछ इतिहासकारों ने इस दावे और गोडसे के संगठनात्मक जीवन की अलग-अलग व्याख्या की है।
इतिहासकारों के बीच भी रहा है मतभेद
गोडसे की RSS से संबद्धता को लेकर इतिहास में एकमत नहीं रहा है। इतिहासकार धीरेंद्र के. झा ने अपनी किताब Gandhi’s Assassin में गोडसे के RSS छोड़ने और हिंदू महासभा में जाने के दावे को लंबे समय से विवादित विषय बताया है।
झा के अनुसार, गोडसे के औपचारिक रूप से हिंदू महासभा में शामिल होने की सही तारीख को लेकर भी स्पष्ट दस्तावेजी प्रमाण का सवाल बना रहा है। इस वजह से गोडसे की राजनीतिक और संगठनात्मक यात्रा को समझने के लिए विभिन्न स्रोतों और उनके संदर्भों को देखना जरूरी है।
इसलिए मौजूदा अदालत की कार्यवाही में सामने आए बयान को उसी संदर्भ में देखना चाहिए। अदालत में सत्यकी सावरकर ने जो कहा है, वह उनकी गवाही का हिस्सा है; इससे पूरे ऐतिहासिक विवाद पर स्वतः अंतिम निष्कर्ष नहीं निकलता।
Congress ने बयान को लेकर RSS पर साधा निशाना
सत्यकी सावरकर के बयान के सामने आते ही कांग्रेस ने RSS को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए। वरिष्ठ कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सच सामने आने का अपना तरीका होता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि RSS लंबे समय से गोडसे से दूरी की बात करता रहा है और अब सावरकर परिवार से जुड़े व्यक्ति के अदालत में दिए बयान ने संगठन के सामने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है।
महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रवक्ता सचिन सावंत ने भी RSS से इस बयान पर स्पष्टीकरण देने की मांग की। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर गोडसे भाइयों के RSS से संबंध नहीं थे तो अदालत में सामने आए इस बयान पर संगठन की क्या प्रतिक्रिया है।
यह बयान अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुका है और कांग्रेस इसे RSS के पुराने रुख के संदर्भ में उठा रही है।
Godse ने खुद क्या कहा था?
महात्मा गांधी की हत्या के मुकदमे के दौरान नाथूराम गोडसे ने अपने संगठनात्मक जीवन के बारे में अपना पक्ष रखा था। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, गोडसे ने कहा था कि उसने RSS छोड़ दिया था और बाद में हिंदू महासभा के साथ काम किया।
उनके इस दावे को लेकर बाद में काफी बहस हुई। कुछ लेखकों ने इसे RSS को गांधी हत्या के आरोपों से अलग रखने के प्रयास के रूप में देखा, जबकि गोडसे के समर्थक या अन्य लेखक उनकी राजनीतिक यात्रा की अलग व्याख्या करते रहे हैं।
यही वजह है कि RSS और नाथूराम गोडसे के संबंधों का सवाल आज भी भारतीय राजनीति और इतिहास की बहस में संवेदनशील विषय बना हुआ है।
सावरकर को लेकर भी कोर्ट में पहले हो चुकी है जिरह
यह पहली बार नहीं है जब इस मामले में वीडी सावरकर के इतिहास और उनके जीवन से जुड़े सवाल अदालत में उठे हैं। इससे पहले की सुनवाई में भी सत्यकी सावरकर से सावरकर की दया याचिकाओं को लेकर सवाल पूछे गए थे।
रिपोर्टों के अनुसार, जिरह के दौरान सत्यकी सावरकर ने यह स्वीकार किया था कि वीडी सावरकर ने दया याचिकाएं दाखिल की थीं। उनसे यह भी पूछा गया था कि क्या उसी दौर के कुछ अन्य क्रांतिकारियों—जैसे राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त और अशफाकउल्ला खान—ने ऐसी दया याचिका नहीं दी थी।
सत्यकी ने इन सवालों के जवाब में संबंधित बातों को स्वीकार किया था। इससे मानहानि मामले की सुनवाई में सावरकर के जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े विभिन्न ऐतिहासिक पहलुओं पर चर्चा होती रही है।
राहुल गांधी और Savarkar विवाद की पृष्ठभूमि
राहुल गांधी और वीडी सावरकर को लेकर राजनीतिक विवाद नया नहीं है। राहुल गांधी कई मौकों पर सावरकर के राजनीतिक विचारों और ब्रिटिश शासन के दौरान उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।
इसी तरह की टिप्पणियों को लेकर सावरकर के परिवार के सदस्यों ने कानूनी कार्रवाई भी की है। पुणे का मौजूदा मामला भी राहुल गांधी की कथित टिप्पणियों से संबंधित है।
हालांकि, इस मामले की कानूनी स्थिति को समझना भी जरूरी है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सावरकर से जुड़ी एक अलग आपराधिक मानहानि कार्यवाही में राहुल गांधी के खिलाफ जारी समन को रद्द कर दिया था। वह मामला मौजूदा पुणे मामले से अलग है।
इसलिए दोनों मामलों को एक ही कानूनी कार्यवाही मानना सही नहीं होगा।
अब आगे क्या होगा?
पुणे में चल रहे मामले में सत्यकी सावरकर की जिरह अभी महत्वपूर्ण चरण में है। अदालत में उनके बयान और बचाव पक्ष द्वारा पूछे गए सवाल आगे की सुनवाई में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
नाथूराम गोडसे और RSS के संबंध को लेकर सत्यकी सावरकर के बयान ने राजनीतिक तापमान जरूर बढ़ा दिया है, लेकिन मामले का अंतिम कानूनी परिणाम अदालत की पूरी कार्यवाही, साक्ष्यों और दलीलों पर निर्भर करेगा।
इस घटनाक्रम ने एक पुराने ऐतिहासिक विवाद को एक बार फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। एक तरफ कांग्रेस इस बयान को RSS से जुड़े अपने सवालों के समर्थन में देख रही है, वहीं इस मुद्दे पर ऐतिहासिक रिकॉर्ड और संगठनात्मक संबद्धता की व्याख्याओं को लेकर लंबे समय से अलग-अलग मत रहे हैं।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि पुणे की अदालत में जिरह के दौरान सत्यकी सावरकर ने नाथूराम गोडसे और गोपाल गोडसे को RSS के सक्रिय कार्यकर्ता बताया है। इस बयान के बाद कांग्रेस ने RSS से जवाब मांगा है और मामला राजनीतिक बहस का नया केंद्र बन गया है।



