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H-1B Visa Fee: ट्रंप प्रशासन का बड़ा कदम, अब 1 करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकती है फीस

H-1B Visa Fee: अमेरिका में नौकरी करने का सपना देख रहे विदेशी प्रोफेशनल्स, खासकर भारतीय टेक कर्मचारियों के लिए H-1B वीजा को लेकर एक बार फिर बड़ी खबर सामने आई है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने नए H-1B वीजा के लिए $103,265 यानी करीब 1 करोड़ रुपये से अधिक की फीस तय करने का प्रस्ताव रखा है। अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने सोमवार, 24 अगस्त 2026 को इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया।

यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि H-1B वीजा अमेरिका की टेक्नोलॉजी, रिसर्च, शिक्षा और दूसरे विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति का प्रमुख रास्ता है। प्रस्तावित नई फीस मौजूदा लागत की तुलना में कई गुना अधिक होगी और अगर यह नियम अंतिम रूप से लागू होता है, तो अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करना काफी महंगा हो सकता है।

हालांकि, फिलहाल H-1B आवेदकों को $103,265 की फीस देने की जरूरत नहीं है। यह अभी प्रस्तावित नियम है और इसके लागू होने से पहले नियामकीय प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

H-1B Visa Fee $103,265 क्यों चर्चा में है?

अमेरिकी सरकार ने H-1B वीजा की प्रस्तावित नई फीस $103,265 रखी है। भारतीय मुद्रा में यह रकम विनिमय दर के हिसाब से लगभग एक करोड़ रुपये से अधिक बैठती है। यह फीस मौजूदा H-1B आवेदन से जुड़े खर्चों के मुकाबले बेहद बड़ी बढ़ोतरी होगी।

DHS का प्रस्ताव annual H-1B cap के तहत आने वाली petitions पर इस अतिरिक्त शुल्क को लागू करने से जुड़ा है। इसमें नियमित cap के साथ अमेरिकी विश्वविद्यालयों से qualifying master’s degree या उससे ऊपर की डिग्री रखने वाले लोगों के लिए निर्धारित 20,000 H-1B visas भी शामिल हैं।

इसका सीधा मतलब यह है कि अगर प्रस्तावित नियम अपने मौजूदा रूप में लागू होता है, तो H-1B lottery के जरिए विदेशी कर्मचारी नियुक्त करने वाली कंपनियों की लागत बहुत तेजी से बढ़ सकती है।

क्या अभी से देनी होगी 1 करोड़ रुपये की H-1B फीस?

नहीं। यह बात H-1B applicants और भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए समझना बेहद जरूरी है।

DHS ने अभी सिर्फ proposed regulation पेश किया है। प्रस्ताव के बाद public comment की प्रक्रिया होगी और उसके बाद सरकार टिप्पणियों तथा कानूनी पहलुओं पर विचार करके अंतिम नियम जारी कर सकती है।

रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्ताव Federal Register में औपचारिक रूप से प्रकाशित होने के बाद 30 दिनों की public comment प्रक्रिया शुरू होगी। इसके बाद प्रशासन अंतिम नियम पर आगे बढ़ सकता है। इसलिए इस समय $103,265 को मौजूदा H-1B visa fee समझना सही नहीं होगा।

ट्रंप प्रशासन पहले भी लगा चुका है $100,000 फीस

H-1B वीजा पर भारी फीस लगाने का यह पहला प्रयास नहीं है। ट्रंप प्रशासन ने 2025 में एक presidential proclamation के जरिए कुछ नए H-1B hires पर $100,000 का शुल्क लगाने की व्यवस्था शुरू की थी।

लेकिन इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई। जून 2026 में एक federal judge ने उस शुल्क को गैरकानूनी करार देते हुए सरकार को इसे वसूलने से रोक दिया। इसके बाद मामला appellate court तक पहुंच गया। जुलाई में First Circuit Court of Appeals ने भी सरकार के पक्ष में उस रोक को हटाने का अनुरोध स्वीकार नहीं किया।

अब DHS regulatory route के जरिए इसी तरह के भारी शुल्क को स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि नई प्रस्तावित फीस को लेकर कानूनी और कारोबारी दोनों स्तरों पर काफी चर्चा हो रही है।

भारतीय H-1B Applicants पर कितना असर पड़ेगा?

H-1B कार्यक्रम में भारतीय प्रोफेशनल्स की बड़ी हिस्सेदारी रही है। अमेरिका की टेक कंपनियों, आईटी सर्विस कंपनियों, रिसर्च संस्थानों और अन्य विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में बड़ी संख्या में भारतीय कर्मचारी H-1B के जरिए काम करते हैं।

ऐसे में H-1B की लागत में इतनी बड़ी बढ़ोतरी भारतीय कर्मचारियों और उन्हें sponsor करने वाली कंपनियों दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि, प्रस्तावित फीस सीधे कर्मचारी की जेब से जाएगी या employer इसे वहन करेगा, यह नियम की अंतिम शर्तों और संबंधित petition की स्थिति पर निर्भर करेगा।

Business groups पहले ही चिंता जता चुके हैं कि अत्यधिक शुल्क के कारण कंपनियों के लिए विदेशी skilled workers को hire करना कठिन हो सकता है। खासकर छोटी और मध्यम कंपनियों के लिए इतनी बड़ी अतिरिक्त लागत एक बड़ी बाधा बन सकती है।

H-1B Visa किन क्षेत्रों के लिए अहम है?

H-1B visa अमेरिकी कंपनियों को ऐसे विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की अनुमति देता है जिनके काम में specialized knowledge और professional expertise की जरूरत होती है। इसका इस्तेमाल टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, शिक्षा, रिसर्च, हेल्थकेयर और कई अन्य क्षेत्रों में किया जाता है।

अमेरिकी टेक इंडस्ट्री लंबे समय से H-1B program पर निर्भर रही है। कंपनियां दुनिया भर से skilled professionals को अमेरिका लाने के लिए इस व्यवस्था का इस्तेमाल करती हैं।

इसी कारण H-1B fee में अचानक इतनी बड़ी बढ़ोतरी केवल immigration policy का मामला नहीं है। इसका असर अमेरिकी कंपनियों की hiring strategy, talent acquisition और कुछ क्षेत्रों में labor costs पर भी पड़ सकता है।

सरकार क्यों बढ़ाना चाहती है इतनी बड़ी फीस?

ट्रंप प्रशासन लंबे समय से H-1B कार्यक्रम को लेकर यह तर्क देता रहा है कि इसका इस्तेमाल अमेरिकी कर्मचारियों की जगह कम लागत वाले विदेशी workers को नियुक्त करने के लिए नहीं होना चाहिए।

प्रशासन का कहना है कि H-1B व्यवस्था में ज्यादा लागत लगाने से कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने के फैसले पर गंभीरता से विचार करेंगी और कार्यक्रम का इस्तेमाल उच्च कौशल वाले कर्मचारियों के लिए अधिक किया जा सकेगा। प्रस्तावित नियम को प्रशासन ने immigration system की लागत वसूलने और H-1B program से जुड़े सरकारी खर्चों के लिए revenue mechanism के रूप में भी पेश किया है।

दूसरी तरफ, कारोबारी संगठनों और कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि अत्यधिक फीस अमेरिकी कंपनियों के लिए ही समस्या पैदा कर सकती है, क्योंकि कई उद्योगों में उन्हें ऐसे skilled workers की जरूरत होती है जो घरेलू स्तर पर आसानी से उपलब्ध नहीं होते।

क्या सभी H-1B applications पर लगेगी $103,265 फीस?

प्रस्ताव की मौजूदा जानकारी के मुताबिक यह शुल्क annual statutory cap के अधीन H-1B petitions पर लागू करने का प्रस्ताव है। इसमें regular cap और U.S. advanced-degree exemption के तहत आने वाले petitions शामिल हैं।

वहीं, कई cap-exempt H-1B petitions को इस प्रस्ताव से बाहर रखने की बात सामने आई है। इनमें कुछ universities, उनसे जुड़े nonprofit organizations और nonprofit या government research organizations शामिल हो सकते हैं। अंतिम नियम में इसकी सटीक शर्तें महत्वपूर्ण होंगी।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि अमेरिका में हर H-1B visa के लिए हर applicant को अनिवार्य रूप से $103,265 देना होगा।

H-1B फीस बढ़ने से अमेरिकी कंपनियों की लागत बढ़ेगी

अगर यह प्रस्ताव अंतिम नियम बन जाता है, तो अमेरिकी employers को H-1B workers को sponsor करने के लिए पहले से कहीं ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ सकती है। खासतौर पर वे कंपनियां प्रभावित हो सकती हैं जो हर साल बड़ी संख्या में foreign professionals को hire करती हैं।

छोटी कंपनियों और startups के लिए इसका प्रभाव और अधिक हो सकता है। इतनी बड़ी upfront cost कुछ employers को H-1B sponsorship से दूर कर सकती है और वे दूसरे देशों में talent hiring या outsourcing जैसे विकल्पों पर विचार कर सकते हैं।

हालांकि, प्रशासन इस तर्क से सहमत नहीं है कि नई फीस के कारण व्यापक स्तर पर अमेरिकी कंपनियां अपना काम विदेश भेज देंगी। इस मुद्दे पर आने वाले public comments और संभावित कानूनी चुनौतियां काफी महत्वपूर्ण रहेंगी।

अदालत में फिर पहुंच सकता है मामला

H-1B fee को लेकर कानूनी विवाद पहले से चल रहा है। 2025 में लगाए गए $100,000 शुल्क को federal court में चुनौती मिली थी और अदालत ने इसे रोक दिया था।

अब DHS ने नया रास्ता अपनाते हुए formal rulemaking शुरू किया है। ऐसे में यदि प्रस्ताव final rule में बदलता है, तो इसकी कानूनी वैधता को लेकर फिर अदालतों का रुख सामने आ सकता है।

यानी आने वाले महीनों में H-1B visa policy को लेकर प्रशासनिक फैसले के साथ-साथ कानूनी लड़ाई भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

भारतीय छात्रों और कर्मचारियों को अभी क्या समझना चाहिए?

भारतीय छात्रों और H-1B applicants के लिए फिलहाल सबसे जरूरी बात यह है कि $103,265 की proposed fee अभी लागू नहीं हुई है। इसलिए केवल इस घोषणा के आधार पर यह मान लेना सही नहीं होगा कि मौजूदा H-1B प्रक्रिया में तुरंत एक करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान करना पड़ेगा।

आगे की स्थिति Federal Register publication, public comments और final regulation पर निर्भर करेगी। इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण होगा कि अंतिम नियम में किन petitions को शामिल किया जाता है, employer पर भुगतान की जिम्मेदारी कैसे तय होती है और संभावित कानूनी चुनौतियों का क्या परिणाम आता है।

H-1B Visa पर ट्रंप प्रशासन की सख्ती जारी

ट्रंप प्रशासन के नए प्रस्ताव से साफ है कि अमेरिका की immigration policy में skilled foreign workers को लेकर सख्त रुख जारी है। H-1B visa पहले से ही अमेरिकी immigration debate के केंद्र में रहा है और अब $103,265 की प्रस्तावित फीस ने इस बहस को और तेज कर दिया है।

अगर यह नियम अंतिम रूप से लागू होता है, तो इसका असर सिर्फ भारतीय IT professionals तक सीमित नहीं रहेगा। अमेरिकी टेक कंपनियों, universities, research organizations और skilled foreign workers की hiring strategy पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।

फिलहाल अगला बड़ा पड़ाव public comment period और उसके बाद आने वाला final rule होगा। इसलिए H-1B applicants के लिए अभी सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि प्रस्ताव और लागू नियम के बीच अंतर को समझें और अंतिम सरकारी घोषणा का इंतजार करें।

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