देश

IDBI Bank Sale: राहुल गांधी और निर्मला सीतारमण में बहस

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बीच एक बार फिर सोशल मीडिया पर तीखी बहस देखने को मिली है। इस बार विवाद की वजह टाटा समूह नहीं, बल्कि IDBI बैंक में सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की हिस्सेदारी बेचने का प्रस्ताव है। राहुल गांधी ने केंद्र सरकार के इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में देश के औद्योगिक विकास के लिए बैंक स्थापित किए गए, जबकि मौजूदा सरकार सरकारी बैंकों को बेच रही है।

राहुल गांधी के आरोपों पर पलटवार करते हुए निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस के पुराने शासनकाल में बैंकों के कामकाज और कर्ज वितरण को लेकर कई सवाल उठाए। वित्त मंत्री ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकारों के दौरान राजनीतिक प्रभाव में बड़े कारोबारी समूहों को कर्ज दिए गए, जिनमें से कई बाद में फंसे हुए कर्ज यानी NPA में बदल गए। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने IDBI बैंक की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए 25,000 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी उपलब्ध कराई और बैंक को दोबारा मजबूत बनाने का काम किया।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब केंद्र सरकार ने कनाडा की Fairfax Financial Holdings से जुड़ी कंपनी को IDBI बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने के लिए मंजूरी दी है। इस प्रस्तावित सौदे की कुल कीमत 52,878 करोड़ रुपये से अधिक है।

IDBI Bank Disinvestment: राहुल गांधी ने सरकारी बैंक की बिक्री पर उठाए सवाल

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने शुक्रवार सुबह एक्स पर पोस्ट करते हुए IDBI बैंक के प्रस्तावित निजीकरण का विरोध किया। उन्होंने कांग्रेस और मोदी सरकार के कार्यकाल की तुलना करते हुए कहा कि कांग्रेस के समय देश के औद्योगिक विकास को गति देने के उद्देश्य से IDBI जैसे संस्थानों की स्थापना की गई थी, जबकि मौजूदा सरकार सरकारी बैंकों में अपनी हिस्सेदारी बेचने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

राहुल गांधी ने अपने पोस्ट में कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में बैंक बनाए जा रहे थे, लेकिन मोदी सरकार के कार्यकाल में उन्हें बेचा जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने पहले बैंक की हिस्सेदारी के लिए बोली प्रक्रिया शुरू की और फिर कीमत तय की।

राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर IDBI बैंक के कर्मचारियों को भी पत्र लिखा। उन्होंने आशंका जताई कि बैंक के निजी हाथों में जाने से कर्मचारियों की नौकरी की शर्तों और आरक्षण व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

कांग्रेस नेता के मुताबिक, निजीकरण के बाद अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आरक्षण से जुड़ी मौजूदा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि कर्मचारियों की सेवा शर्तों को मिलने वाली सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है।

राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस एक ऐसे सार्वजनिक क्षेत्र का समर्थन करती है, जिसमें सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र मिलकर देश के विकास में योगदान दें। उनके अनुसार, सार्वजनिक बैंक केवल संपत्ति नहीं हैं, बल्कि आर्थिक और औद्योगिक विकास के महत्वपूर्ण साधन हैं।

निर्मला सीतारमण का पलटवार, कांग्रेस पर लगाए गंभीर आरोप

राहुल गांधी के बयान के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक्स पर विस्तार से जवाब दिया। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसके शासनकाल में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का इस्तेमाल राजनीतिक रूप से प्रभावशाली कारोबारियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया।

सीतारमण ने दावा किया कि IDBI बैंक को NDA सरकार के सत्ता में आने से पहले खराब वित्तीय स्थिति का सामना करना पड़ रहा था। उनके मुताबिक, बैंक पर बड़े कारोबारी समूहों को कर्ज देने का दबाव था और इनमें से कई कर्ज बाद में खराब कर्ज में बदल गए।

वित्त मंत्री ने Videocon, Winsome, ABG Shipyard और Kingfisher जैसे कारोबारी समूहों का नाम लेते हुए कहा कि इनसे जुड़े कर्जों के कारण IDBI बैंक को भारी नुकसान हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि इन समूहों के कांग्रेस नेताओं से करीबी संबंध थे।

सीतारमण ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली NDA सरकार ने पेशेवर प्रबंधन, सतर्क कर्ज नीति और 25,000 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी उपलब्ध कराकर बैंक की स्थिति सुधारने का प्रयास किया। उन्होंने यह भी दावा किया कि IDBI बैंक अब विकास के अगले चरण के लिए तैयार है।

वित्त मंत्री ने प्रस्तावित हिस्सेदारी बिक्री का बचाव करते हुए कहा कि रणनीतिक पुनर्गठन की प्रक्रिया में सभी जरूरी नियमों और प्रक्रियाओं का पालन किया गया है।

कांग्रेस शासनकाल के बैंकिंग विवादों का भी किया जिक्र

निर्मला सीतारमण ने अपने जवाब में कांग्रेस के शासनकाल के दौरान सामने आए कुछ पुराने बैंकिंग विवादों का भी उल्लेख किया। उन्होंने 1957 के मुंद्रा घोटाले का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि उस समय राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर LIC से हरिदास मुंद्रा को फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई थी।

उन्होंने 1976 में भारतीय स्टेट बैंक के तत्कालीन चेयरमैन आरके तलवार को पद से हटाए जाने का मामला भी उठाया। सीतारमण के अनुसार, तलवार ने राजनीतिक दबाव में कर्ज देने की शर्तों में ढील देने से इनकार किया था, जिसके बाद तत्कालीन सरकार ने उनके खिलाफ कार्रवाई की।

वित्त मंत्री ने संजय गांधी से जुड़े मारुति कारोबार के लिए कर्ज देने के मामले का भी उल्लेख किया। इसके अलावा उन्होंने कांग्रेस सरकार में वित्त राज्य मंत्री रहे बी. जनार्दन पुजारी पर 1980 के दशक में बैंक कर्मचारियों पर कर्ज देने का दबाव बनाने का आरोप लगाया।

सीतारमण ने पूर्व UPA मंत्री पवन कुमार बंसल का नाम लेते हुए भी दावा किया कि उन्होंने परिवार से जुड़े कारोबार को केनरा बैंक से कर्ज दिलाने के लिए दबाव बनाया था।

इन सभी मामलों का उल्लेख करते हुए वित्त मंत्री ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के शासनकाल में प्रभावशाली लोगों के लिए बैंकिंग नियमों में ढील दी जाती थी, जबकि आम नागरिकों को सामान्य प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता था। ये आरोप सीतारमण के राजनीतिक जवाब का हिस्सा हैं और इन्हें उनके दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

वित्त मंत्री ने राफेल और इकोनॉमिक व्हाइट पेपर का भी किया जिक्र

निर्मला सीतारमण ने अपने जवाब में कांग्रेस पर आर्थिक कुप्रबंधन और पुराने घोटालों को लेकर भी निशाना साधा। उन्होंने फरवरी 2024 में जारी भारतीय अर्थव्यवस्था पर श्वेत पत्र यानी White Paper का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें कांग्रेस के शासनकाल के दौरान सामने आए कई मामलों का विवरण दिया गया है।

उन्होंने राहुल गांधी को राफेल विमान सौदे से जुड़े पुराने विवाद की भी याद दिलाई। सीतारमण ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने पहले भी इस मामले में गलत दावे किए थे और उन्हें बाद में माफी मांगनी पड़ी थी। उन्होंने कहा कि IDBI बैंक के मामले में भी कांग्रेस के आरोपों का जवाब तथ्यों के आधार पर दिया जाएगा।

वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि मौजूदा समय में आम नागरिकों को बैंक से कर्ज लेने की बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं और बैंक कर्मचारियों पर राजनीतिक फोन कॉल के जरिए कर्ज मंजूर करने का दबाव नहीं है।

52,878 करोड़ रुपये में होगी IDBI बैंक की 60.72% हिस्सेदारी की बिक्री

IDBI बैंक के प्रस्तावित निजीकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी हिस्सेदारी और सौदे की कीमत है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 14 अक्टूबर 2026 को बैंक की कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी।

इस सौदे के तहत कनाडा की Fairfax Financial Holdings की मूल कंपनी से जुड़ी 10955230 Canada Inc. को रणनीतिक खरीदार के रूप में मंजूरी दी गई है। इस हिस्सेदारी की कुल खरीद कीमत 52,878.08 करोड़ रुपये तय की गई है।

सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगी, जबकि LIC अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी का विनिवेश करेगी। इस प्रक्रिया के बाद केंद्र सरकार के पास IDBI बैंक की 15 प्रतिशत और LIC के पास 19 प्रतिशत हिस्सेदारी बची रहेगी।

वित्त मंत्रालय के अनुसार, यह सौदा बैंक की कुल हिस्सेदारी के रणनीतिक पुनर्गठन का हिस्सा है। इसका अर्थ है कि सरकार और LIC पूरी तरह बैंक से बाहर नहीं होंगे, बल्कि दोनों की हिस्सेदारी कम हो जाएगी।

IDBI Bank Deal की कीमत और बोली प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

IDBI बैंक की हिस्सेदारी बिक्री को लेकर केवल राजनीतिक बयानबाजी ही नहीं, बल्कि सौदे की कीमत और बोली प्रक्रिया पर भी सवाल उठे हैं। इसी बीच वित्त मंत्रालय ने 29 अक्टूबर को एक विस्तृत स्पष्टीकरण जारी कर पूरी प्रक्रिया का बचाव किया।

मंत्रालय के मुताबिक, शुरुआती बोली प्रक्रिया वित्त वर्ष 2025-26 में हुई थी, लेकिन उस दौरान प्राप्त बोलियों को मंजूरी नहीं दी गई। इसके बाद योग्य बोलीदाताओं से बेहतर प्रस्ताव मांगे गए। इस दूसरे चरण की प्रक्रिया को विनिवेश से जुड़े सचिवों के मुख्य समूह यानी Core Group of Secretaries on Disinvestment ने मंजूरी दी थी।

सरकार का कहना है कि इस प्रक्रिया में रिजर्व प्राइस को न तो कम किया गया और न ही बढ़ाया गया। मंत्रालय के अनुसार, स्वतंत्र सलाहकारों ने 31 मार्च 2026 तक उपलब्ध वित्तीय जानकारी के आधार पर अलग-अलग तरीकों से बैंक का मूल्यांकन किया था।

वित्त मंत्रालय ने यह भी दावा किया कि दूसरी बोली प्रक्रिया से सौदे की कीमत में 3,917 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई। इसके अलावा विवादित टैक्स मांगों से जुड़ी संभावित देनदारी का आकलन 627 करोड़ रुपये किया गया है। मंत्रालय के मुताबिक, इस व्यवस्था से सरकार और LIC को मिलने वाली राशि बढ़ाने में मदद मिली।

IDBI Bank के निजीकरण पर कर्मचारियों और राजनीतिक दलों की नजर

IDBI बैंक की प्रस्तावित हिस्सेदारी बिक्री को लेकर अब राजनीतिक बहस के साथ-साथ कर्मचारियों और बैंकिंग क्षेत्र की चिंताएं भी चर्चा में हैं। राहुल गांधी ने जहां आरक्षण और कर्मचारियों की सेवा शर्तों को लेकर सवाल उठाए हैं, वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि बैंक की वित्तीय स्थिति सुधारने और उसके विकास के अगले चरण के लिए रणनीतिक पुनर्गठन जरूरी है।

इस पूरे मामले में एक तरफ सरकार सौदे की प्रक्रिया, मूल्यांकन और बैंक की वित्तीय स्थिति में सुधार को आधार बना रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस सार्वजनिक बैंकों की भूमिका और कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर सवाल उठा रही है।

निष्कर्ष

IDBI बैंक की 52,878 करोड़ रुपये की प्रस्तावित हिस्सेदारी बिक्री ने राहुल गांधी और निर्मला सीतारमण के बीच नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। राहुल गांधी ने इसे सरकारी बैंकों को बेचने की नीति बताते हुए कर्मचारियों के आरक्षण और सेवा शर्तों पर चिंता जताई है। वहीं वित्त मंत्री ने कांग्रेस के पुराने बैंकिंग विवादों का हवाला देकर मौजूदा सरकार के फैसले का बचाव किया है।

अब इस मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि प्रस्तावित रणनीतिक पुनर्गठन से IDBI बैंक के भविष्य, कर्मचारियों की स्थिति और बैंकिंग व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा। सौदे की प्रक्रिया आगे बढ़ने के साथ इन मुद्दों पर राजनीतिक और आर्थिक चर्चा जारी रहने की संभावना है।

Related Articles

Back to top button