
छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सली हिंसा से प्रभावित लोगों के पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन को लेकर केंद्र सरकार ने सहायता अभियान पर जोर दिया है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने 15 अक्टूबर 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से दिव्यांगजनों को संबोधित करते हुए कहा कि हिंसा के कारण लोगों को जो शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी है, उसे दूर करने के लिए अब ठोस प्रयास करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि सेवा संकल्प अभियान के तहत कृत्रिम अंग और अन्य सहायक उपकरण उपलब्ध कराने की पहल की जा रही है।
अमित शाह के मुताबिक, इस अभियान के तहत बस्तर क्षेत्र के 1,570 से अधिक दिव्यांगजन लाभार्थियों को सहायता दी जा रही है। उन्होंने कहा कि माओवादी हिंसा के कारण प्रभावित हुए लोगों को केवल सहायता उपकरण देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाने और समाज में सम्मान के साथ जीवन जीने के अवसर भी उपलब्ध कराने होंगे।
सेवा संकल्प अभियान के तहत दिव्यांगजनों को मिलेगी सहायता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर सेवा संकल्प अभियान के तहत देश के अलग-अलग हिस्सों में जनसेवा से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी अभियान के अंतर्गत छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा से प्रभावित दिव्यांगजनों को कृत्रिम अंग और जरूरत के अनुसार अन्य सहायक उपकरण उपलब्ध कराने की पहल की गई है।
अमित शाह ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि हिंसा के कारण दिव्यांग हुए लोगों को बेहतर जीवन देने के लिए केंद्र और राज्य सरकार मिलकर काम कर रही हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पीड़ितों को ऐसी सुविधाएं मिलनी चाहिए, जिनसे वे रोजमर्रा के काम अधिक आसानी से कर सकें और अपनी जिंदगी को दोबारा व्यवस्थित कर सकें।
इस पहल के अंतर्गत जरूरतमंद लोगों को कृत्रिम हाथ-पैर, व्हीलचेयर, ट्राइसाइकिल, बैसाखी, श्रवण यंत्र और स्मार्ट वॉकिंग स्टिक जैसे उपकरण उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इन सुविधाओं का उद्देश्य दिव्यांगजनों की आवाजाही आसान बनाना और उन्हें अधिक स्वतंत्रता के साथ जीवन जीने में मदद करना है।
बस्तर के 1,570 से अधिक दिव्यांगजन लाभार्थियों में शामिल
अमित शाह ने अपने संबोधन में बस्तर के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस क्षेत्र से 1,570 से अधिक दिव्यांगजन सहायता पाने वालों में शामिल हैं। उन्होंने इसे बस्तर में लंबे समय तक चली हिंसा के मानवीय प्रभाव का संकेत बताया।
बस्तर और आसपास के आदिवासी इलाकों में नक्सली हिंसा के दौरान कई नागरिकों को विस्फोटों और अन्य घटनाओं के कारण गंभीर चोटें आईं। कुछ लोगों को स्थायी शारीरिक दिव्यांगता का सामना करना पड़ा। ऐसे लोगों के लिए कृत्रिम अंग और अन्य सहायक उपकरण केवल सुविधा का साधन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
जगदलपुर में 5 से 7 अक्टूबर 2026 के बीच आयोजित दिव्यांग सेवा शिविर में 3,600 से अधिक दिव्यांगजनों को सहायता पहुंचाने की जानकारी दी गई थी। इनमें बस्तर के लाभार्थियों की संख्या 1,570 से अधिक बताई गई। इस कार्यक्रम में विभिन्न सरकारी विभागों और सामाजिक संगठनों ने भी सहयोग किया।
अमित शाह ने नक्सली हिंसा को बताया मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन
गृह मंत्री अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा कि राजनीतिक उद्देश्य हासिल करने के लिए आईईडी विस्फोटों के जरिए निर्दोष नागरिकों को दिव्यांग बना देना मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि हिंसा के कारण जिन परिवारों ने अपनों को खोया या जिन लोगों को जीवनभर शारीरिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, उनकी मदद करना जरूरी है।
शाह ने कहा कि नक्सलवाद के प्रभाव को समाप्त करने का अर्थ केवल हिंसा की घटनाओं पर रोक लगाना नहीं है। इसके साथ उन लोगों के जीवन में सुधार लाना भी जरूरी है, जो वर्षों तक इस संघर्ष के कारण प्रभावित हुए। उन्होंने पुनर्वास और सहायता को आगे की प्राथमिकताओं में शामिल करने पर जोर दिया।
उनके अनुसार, प्रभावित नागरिकों को सम्मानजनक जीवन देने के लिए केंद्र सरकार छत्तीसगढ़ सरकार के साथ मिलकर काम करेगी। पुनर्वास की प्रक्रिया में दिव्यांगजनों की जरूरतों को समझना, आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराना और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना अहम भूमिका निभा सकता है।
नक्सलवाद के बाद बस्तर में विकास पर जोर
अमित शाह ने कहा कि नक्सल हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में अब विकास और जनकल्याण से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने बस्तर में बुनियादी सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने और आदिवासी समुदायों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए चल रही योजनाओं का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि जिन इलाकों में पहले हिंसा और भय का माहौल था, वहां लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य, आवागमन और सरकारी योजनाओं का लाभ उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है। विकास की प्रक्रिया तभी प्रभावी होगी, जब दूरस्थ गांवों तक भी सुविधाएं पहुंचें और स्थानीय लोगों को रोजगार, आजीविका तथा सामाजिक भागीदारी के अवसर मिलें।
बस्तर जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र में विकास के साथ स्थानीय परंपराओं और संस्कृति को संरक्षित रखना भी महत्वपूर्ण है। इसी उद्देश्य से खेल, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और बुनियादी सेवाओं से जुड़ी योजनाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
नियद नेल्लानार योजना से गांवों तक सुविधाएं पहुंचाने का प्रयास
अमित शाह ने अपने संबोधन में नियद नेल्लानार योजना का जिक्र करते हुए कहा कि बस्तर के दूरस्थ इलाकों में आधारभूत सुविधाएं पहुंचाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। इस तरह की योजनाओं का उद्देश्य उन गांवों तक सरकारी सेवाओं की पहुंच बढ़ाना है, जहां भौगोलिक कठिनाइयों और लंबे समय तक चले संघर्ष के कारण सुविधाएं पहुंचाना चुनौतीपूर्ण रहा है।
स्थानीय स्तर पर सरकारी सेवाओं की उपलब्धता बढ़ने से ग्रामीणों को जरूरी कामों के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों में जाने की आवश्यकता कम हो सकती है। इससे पहचान पत्र, राशन, बैंकिंग और अन्य कल्याणकारी सुविधाओं तक पहुंच आसान बनाने में मदद मिल सकती है।
बस्तर में विकास के लिए केवल सड़कों और भवनों का निर्माण ही पर्याप्त नहीं है। स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, रोजगार, संचार और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करना भी जरूरी है। योजनाओं का वास्तविक लाभ तभी दिखाई देगा, जब पात्र परिवारों तक समय पर सहायता पहुंचे और उन्हें सेवाओं का लाभ लेने में अनावश्यक परेशानी न हो।
बस्तर ओलंपिक से युवाओं को खेलों से जोड़ने की पहल
गृह मंत्री ने बस्तर ओलंपिक का उल्लेख करते हुए कहा कि क्षेत्र में खेल गतिविधियों के माध्यम से युवाओं को सकारात्मक अवसर उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। बस्तर में खेल आयोजन स्थानीय युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने और सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने का मंच प्रदान करते हैं।
लंबे समय तक हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में खेलों की भूमिका केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती। खेल प्रतियोगिताएं युवाओं में अनुशासन, टीम भावना और आपसी सहयोग को प्रोत्साहित कर सकती हैं। इसके साथ ही स्थानीय प्रतिभाओं को आगे बढ़ने और बड़े मंचों तक पहुंचने का अवसर मिल सकता है।
बस्तर में खेल गतिविधियों को बढ़ावा देने का उद्देश्य युवाओं को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना और क्षेत्र की सकारात्मक पहचान को मजबूत करना भी है। हालांकि, इन प्रयासों का स्थायी प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि खेल सुविधाएं, प्रशिक्षण और नियमित प्रतियोगिताएं गांवों तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती हैं।
बस्तर पंडुम से जनजातीय कला और संस्कृति को बढ़ावा
अमित शाह ने बस्तर पंडुम का भी जिक्र किया। यह आयोजन बस्तर की जनजातीय कला, लोकनृत्य, संगीत, खानपान और पारंपरिक जीवनशैली को सामने लाने का मंच है। इसका उद्देश्य स्थानीय सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना और उसे व्यापक पहचान दिलाना है।
बस्तर की जनजातीय संस्कृति क्षेत्र की महत्वपूर्ण पहचान रही है। लोककलाओं, पारंपरिक वेशभूषा, गीत-संगीत और स्थानीय रीति-रिवाजों के संरक्षण से नई पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ने में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए स्थानीय कलाकारों और कारीगरों को भी अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर मिलता है।
बस्तर पंडुम जैसे कार्यक्रम क्षेत्र में सांस्कृतिक पर्यटन की संभावनाओं को भी बढ़ा सकते हैं। यदि स्थानीय समुदायों की भागीदारी के साथ इन्हें आगे बढ़ाया जाए, तो इससे कलाकारों और छोटे कारोबारियों के लिए आजीविका के अवसर पैदा करने में सहायता मिल सकती है।
सुरक्षा शिविरों को सेवा केंद्रों में बदलने की योजना
अमित शाह ने अपने संबोधन में बताया कि बस्तर में पहले स्थापित 500 से अधिक सुरक्षा शिविरों में से 200 से ज्यादा को शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा के रूप में विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिन स्थानों पर पहले सुरक्षा व्यवस्था के लिए जवान तैनात रहते थे, वहां अब सरकारी सेवाओं और विकास से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ाने की योजना है।
इस पहल का उद्देश्य दूरस्थ क्षेत्रों में सरकारी तंत्र की पहुंच को मजबूत करना और स्थानीय नागरिकों को जरूरी सेवाएं उपलब्ध कराना है। ऐसे केंद्रों के जरिए ग्रामीणों को विभिन्न सरकारी योजनाओं की जानकारी और सुविधाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इन केंद्रों की उपयोगिता इस बात से तय होगी कि वहां कौन-कौन सी सेवाएं नियमित रूप से उपलब्ध होती हैं, कर्मचारियों की तैनाती कैसी रहती है और स्थानीय लोगों को योजनाओं का लाभ कितनी आसानी से मिलता है। प्रभावी संचालन के साथ ये केंद्र बस्तर के दूरस्थ गांवों में प्रशासन और नागरिकों के बीच संपर्क बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं।
पीड़ितों का पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन सबसे अहम
अमित शाह के संबोधन का मुख्य संदेश नक्सली हिंसा से प्रभावित नागरिकों के पुनर्वास और बस्तर में विकास को आगे बढ़ाने पर केंद्रित रहा। कृत्रिम अंगों और सहायक उपकरणों की उपलब्धता दिव्यांगजनों की दैनिक गतिविधियों को आसान बनाने में मदद कर सकती है। इसके साथ ही उन्हें रोजगार, शिक्षा और सामाजिक भागीदारी के अवसर उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
बस्तर में लंबे समय तक हिंसा का सामना करने वाले परिवारों के लिए पुनर्वास एक व्यापक प्रक्रिया है। इसमें शारीरिक सहायता के साथ आर्थिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और सरकारी योजनाओं तक पहुंच भी शामिल है। स्थानीय समुदायों की जरूरतों को ध्यान में रखकर किए गए प्रयास ही दीर्घकालिक बदलाव ला सकते हैं।
सेवा संकल्प अभियान के तहत दिव्यांगजनों को सहायता देने की पहल इसी दिशा में एक कदम है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि लाभार्थियों तक उपकरणों की उपलब्धता, उनके रखरखाव और अन्य पुनर्वास सुविधाओं को किस तरह सुनिश्चित किया जाता है। बस्तर में शांति, विकास और सम्मानजनक जीवन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रभावित लोगों की जरूरतों को केंद्र में रखना जरूरी होगा।



