
लाइव अपडेट्स | 16 मई, 2026 | West Asia Crisis: मध्य पूर्व से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर यह है कि इजरायल और लेबनान के बीच छिड़ी जंग को शांत करने के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज हो गए हैं। रविवार को खत्म हो रही डेडलाइन से पहले दोनों देशों ने सीजफायर को 45 दिनों के लिए और बढ़ाने का फैसला किया है। लेकिन क्या जमीन पर शांति स्थापित हो पाई है? इसका जवाब है ‘नहीं’। एक तरफ वाशिंगटन में शांति की बातें हो रही हैं, तो दूसरी तरफ दक्षिणी लेबनान में इजरायली मिसाइलें अब भी तबाही मचा रही हैं।
इस वक्त की 5 बड़ी बातें:
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45 दिनों का एक्सटेंशन: रविवार की समयसीमा खत्म होने से ठीक पहले लेबनान ने इजरायल के साथ युद्धविराम बढ़ाने के समझौते की पुष्टि की।
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सफेद कपड़ों पर हमला: शनिवार सुबह दक्षिणी लेबनान में एक मेडिकल रेस्क्यू सेंटर पर इजरायल ने बमबारी की। इस हमले में 3 डॉक्टरों (पैरामेडिक्स) सहित 6 लोग मारे गए।
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ट्रंप का ईरान को ऑफर: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सामने शर्त रखी है कि वह अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम को 20 साल के लिए ठंडे बस्ते में डाल दे, तो बातचीत बन सकती है।
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ईरान का यू-टर्न: ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भारत (नई दिल्ली) में बयान दिया कि उन्हें अमेरिका से बातचीत जारी रखने के गुप्त संदेश मिले हैं और वे चीन की मध्यस्थता के लिए भी तैयार हैं।
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चीन ने बदला पासा?: ट्रंप के दावों के अनुसार, चीन अब इस युद्ध में ईरान को कोई भी हथियार सप्लाई नहीं करेगा और वह तेल की सप्लाई के लिए ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ को खुलवाना चाहता है।
युद्धविराम सिर्फ कागजों पर?
भले ही दोनों देश कूटनीतिक रूप से सीजफायर बढ़ाने पर राजी हो गए हों, लेकिन 17 अप्रैल को हुए पहले समझौते के बाद से अब तक सैकड़ों लेबनानी नागरिकों की मौत हो चुकी है। राहत और बचाव कार्य में जुटे पैरामेडिक्स को निशाना बनाए जाने से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों में भी नाराजगी है। पिछले 24 घंटों में ही लेबनान के अलग-अलग गांवों में 12 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
क्या मान जाएगा ईरान?
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ कर दिया है कि वे बातचीत के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन ‘यूरेनियम संवर्धन’ (Nuclear Material) के मुद्दे पर दोनों देश अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं। ट्रंप प्रशासन चाहता है कि ईरान स्थायी रूप से बैकफुट पर आए, जबकि ईरान अपने आत्मसम्मान और आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने की शर्त पर अड़ा है।
दोनों ही स्थितियों में, मध्य पूर्व की राजनीति अब एक बेहद नाजुक मोड़ पर है। 45 दिनों का यह एक्सटेंशन दुनिया को तेल संकट से तो कुछ समय के लिए बचा सकता है, लेकिन जब तक इजरायल के हमले पूरी तरह नहीं रुकते और ईरान-अमेरिका के बीच न्यूक्लियर डेडलॉक खत्म नहीं होता, तब तक स्थायी शांति की उम्मीद करना बेमानी होगा।



