शिक्षा

Student Suicide Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, कॉलेजों को पुलिस को तुरंत सूचना देनी होगी

Student Suicide Supreme Court: छात्रों की बढ़ती मानसिक समस्याओं और आत्महत्या के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और सख्त कदम उठाया है। गुरुवार को शीर्ष अदालत ने देशभर के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों (Higher Education Institutions – HEIs) को निर्देश दिया कि यदि किसी छात्र की आत्महत्या या किसी भी तरह की अस्वाभाविक मौत होती है, तो उसकी जानकारी तुरंत पुलिस को देना अनिवार्य होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि कॉलेज और विश्वविद्यालय इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। अदालत के मुताबिक, किसी भी शिक्षण संस्थान का यह बुनियादी कर्तव्य है कि वह छात्रों के लिए एक सुरक्षित, समान, समावेशी और सकारात्मक सीखने का माहौल सुनिश्चित करे।

हर मौत की रिपोर्ट अनिवार्य

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह आदेश सिर्फ कैंपस तक सीमित नहीं है। यदि छात्र की मौत हॉस्टल, पीजी, किराए के कमरे या कॉलेज परिसर से बाहर भी होती है, तब भी उसे रिपोर्ट करना अनिवार्य होगा।

अदालत ने यह भी साफ किया कि यह नियम सभी छात्रों पर लागू होगा, चाहे वे रेगुलर क्लासरूम, डिस्टेंस लर्निंग या ऑनलाइन मोड में पढ़ाई कर रहे हों। जैसे ही किसी संस्थान को इस तरह की घटना की जानकारी मिले, बिना किसी देरी के पुलिस को सूचित करना होगा।

UGC और शिक्षा मंत्रालय को सालाना रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि सभी उच्च शिक्षण संस्थान हर साल अपने यहां हुई छात्र आत्महत्याओं या अस्वाभाविक मौतों की वार्षिक रिपोर्ट यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) और अन्य संबंधित नियामक संस्थाओं को सौंपें।

जिन केंद्रीय विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों या अन्य HEIs पर यह ढांचा लागू नहीं होता, उन्हें यह रिपोर्ट शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग को भेजनी होगी।

मेडिकल सुविधा 24 घंटे उपलब्ध हो

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि सभी रेजिडेंशियल कॉलेज और विश्वविद्यालयों में छात्रों के लिए 24 घंटे योग्य मेडिकल सहायता उपलब्ध होनी चाहिए। अगर कैंपस के अंदर यह सुविधा संभव नहीं है, तो कम से कम एक किलोमीटर के दायरे में आपात चिकित्सा सुविधा होनी चाहिए, ताकि किसी भी आपात स्थिति में छात्रों को तुरंत मदद मिल सके।

फैकल्टी की कमी पर भी सख्ती

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के कई कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में फैकल्टी की कमी पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि शिक्षण और गैर-शिक्षण दोनों तरह के सभी खाली पद चार महीने के भीतर भरे जाने चाहिए।

विशेष रूप से यह निर्देश दिया गया कि हाशिए पर रहने वाले और कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों, जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और दिव्यांग व्यक्तियों (PwDs) के लिए आरक्षित पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरा जाए।

अदालत ने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर केंद्र और राज्य सरकार के नियमों के तहत विशेष भर्ती अभियान चलाए जा सकते हैं।

छात्र आत्महत्या केवल समस्या का एक हिस्सा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि छात्र आत्महत्या केवल एक बड़ी समस्या का दिखाई देने वाला हिस्सा है। इसके पीछे छात्रों का मानसिक तनाव, पढ़ाई का दबाव, आर्थिक समस्याएं और संस्थागत खामियां भी जिम्मेदार होती हैं।

इसी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि कुलपति, रजिस्ट्रार और अन्य प्रमुख प्रशासनिक पदों को चार महीने के भीतर भरा जाए। भविष्य में यह सुनिश्चित किया जाए कि जैसे ही कोई पद खाली हो, एक महीने के भीतर उस पर नियुक्ति हो जाए, ताकि संस्थान का कामकाज प्रभावित न हो।

आरक्षित पदों और छात्रवृत्ति पर जवाबदेही

अदालत ने सभी HEIs को निर्देश दिया कि वे हर साल केंद्र और राज्य सरकारों को यह जानकारी दें कि कितने आरक्षित पद खाली हैं, कितने भरे गए हैं, क्यों पद नहीं भरे जा सके और इसमें कितना समय लगा। इससे संस्थानों की जवाबदेही तय हो सकेगी।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने छात्रवृत्ति के मामलों में भी सख्त रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि लंबित छात्रवृत्ति भुगतान को चार महीने के भीतर पूरा किया जाए। भविष्य में छात्रवृत्ति का भुगतान तय समयसीमा के अंदर होना चाहिए।

छात्रवृत्ति में देरी का खामियाजा छात्र नहीं भुगतेंगे

अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर किसी कारणवश छात्रवृत्ति के भुगतान में प्रशासनिक देरी होती है, तो इसका बोझ छात्रों पर नहीं डाला जा सकता।

कोई भी छात्र परीक्षा देने से नहीं रोका जाएगा, हॉस्टल से नहीं निकाला जाएगा, क्लास अटेंड करने से नहीं रोका जाएगा और न ही उसकी मार्कशीट या डिग्री रोकी जाएगी। अगर किसी संस्थान की ऐसी नीति पाई गई, तो उसे गंभीरता से लिया जाएगा।

रैगिंग और अन्य नियमों का पालन जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को निर्देश दिया कि वे UGC के रैगिंग विरोधी नियमों (2009) समेत सभी बाध्यकारी नियमों का सख्ती से पालन करें।

इसके अलावा अदालत ने कहा कि 15 से 29 वर्ष की उम्र के छात्रों में आत्महत्या से जुड़े आंकड़ों को केंद्र स्तर पर एकत्र किया जाए, ताकि सही और सटीक आंकड़े सामने आ सकें।

राष्ट्रीय टास्क फोर्स पहले ही गठित

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल छात्रों की मानसिक सेहत और आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए एक राष्ट्रीय टास्क फोर्स (NTF) का गठन किया था। अदालत का मानना है कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और भलाई का भी ध्यान रखना उतना ही जरूरी है।

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