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Baramulla Movie Review: कश्मीर के घावों को डर की परछाइयों में दिखाती भावनात्मक कहानी

Baramulla Movie Review– नेटफ्लिक्स पर हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म ‘Baramulla’ को सिर्फ एक हॉरर फिल्म के रूप में देखना इसके असल मर्म को कम कर देता है। यह फिल्म डर का इस्तेमाल सिर्फ सिहरन पैदा करने के लिए नहीं करती, बल्कि वह उन दर्दनाक परतों को सामने लाती है जिनमें कश्मीर का इतिहास, राजनीति और समाज की सबसे गहरी चोटें छिपी हैं। यह फिल्म एक ऐसे दौर की कहानी को छूती है, जब कश्मीर पहचान, विचार और भविष्य के संकटों से जूझ रहा था।

कहानी हमें 2016 के कश्मीर में ले जाती है—एक ऐसा समय, जब घाटी राजनीतिक तनाव, अस्थिरता और असुरक्षा की धुंध में जकड़ी थी। इसी माहौल में एक अजीब सी अशुभ घटना लोगों के बीच फैल जाती है। जहाँ भी सफेद ट्यूलिप दिखाई देता है, वहाँ से बच्चे रहस्यमय तरीके से गायब होने लगते हैं। यह घटना घाटी की पहले से मौजूद बेचैनी को और भी गहरा कर देती है।

इन गायब बच्चों की जांच का जिम्मा मिलता है DSP रिदवान को, जिसे एक पुराने विवाद के कारण अपने प्रतिष्ठित पद से हटाकर बारामूला भेजा गया है। रिदवान अपने परिवार—पत्नी गुलनार, बेटी नूरी और बेटे अयान—के साथ घाटी के एक पुराने घर में रहने आता है। यह घर शुरू से ही अपने भीतर कुछ रहस्य समेटे बैठा है। जैसे ही परिवार यहाँ कदम रखता है, घर की दीवारें, लकड़ी की फर्श और हवा का सन्नाटा एक अनदेखी बेचैनी की कहानी कहने लगते हैं।

गुलनार और बच्चे इस माहौल को बहुत जल्दी महसूस कर लेते हैं। उन्हें इस घर में कोई अदृश्य उपस्थिति नज़र आती है—कभी कानों में फुसफुसाहट, कभी आधी रात में कमरे में साया, तो कभी अयान और नूरी के व्यवहार में अचानक आए बदलाव। लेकिन रिदवान, जो अपनी सोच और तर्क पर विश्वास करता है, इन चीजों को मन की भ्रांति समझकर नज़रअंदाज़ कर देता है।

उधर, घाटी में बच्चों का गायब होना लगातार बढ़ता जा रहा है। गाँव वाले इसे जिन्न, चुड़ैल और पुराने श्राप से जोड़ते हैं। रिदवान शुरुआत में स्थानीय अफवाहों को महत्व नहीं देता, लेकिन परिस्थितियाँ उसे भी संदेह में डाल देती हैं। दबाव में वह एक जादूगर को गिरफ्तार कर लेता है, लेकिन जल्द ही उसे एहसास होता है कि यह समस्या किसी व्यक्ति या अंधविश्वास से कहीं आगे है।

यहाँ फिल्म एक बेहद मजबूत मोड़ लेती है।

कहानी अचानक सिर्फ डर से नहीं, बल्कि विचारधारा की लड़ाई से भर जाती है। घाटी में एक स्लीपर सेल सक्रिय है, जो युवाओं को “आजादी” के नाम पर उग्र विचारों की ओर मोड़ रहा है। फिल्म इस बात को बेहद गंभीरता से उभारती है कि कश्मीर में संघर्ष सिर्फ धरती का नहीं, बल्कि भविष्य और पहचान का है। यहाँ सबसे बड़ी लड़ाई उन बच्चों के मन में चलती है, जिन्हें यह नहीं पता कि वे किसके लिए और क्यों लड़ेंगे।

फिल्म कश्मीर की फिजिकल खूबसूरती को भी पूरी गंभीरता से दिखाती है। बर्फ से ढके पेड़, झीलों की ठंडक, लकड़ी के भव्य लेकिन सुनसान घर—यह सब मिलकर एक ऐसी असहज ख़ूबसूरती रचते हैं, जहाँ अच्छा और बुरा, सच और भ्रम, जीवन और मृत्यु के बीच कोई साफ़ रेखा नहीं बचती।

कहानी के भीतर मौजूद किरदार भी इस संघर्ष का प्रतीक हैं।

  • गुलनार—जो परिवार को बचाना चाहती है, लेकिन अंदर ही अंदर टूट रही है

  • नूरी—जिसके भीतर एक ऐसा गुस्सा है, जिसका नाम कोई नहीं लेता

  • अयान—जो मासूमियत और डर के बीच फँसा है

  • और मूक नौकर इक़बाल—जो इस घर का ऐसा हिस्सा है, जिसे सब देखते हैं, लेकिन समझते कोई नहीं

इक़बाल का बार-बार एक बंद कमरे में गायब होना, और फिर चुपचाप वापस आ जाना, कहानी के रहस्य को और गहरा करता है।

फिल्म का पहला हिस्सा थोड़ा धीमा महसूस हो सकता है, और किरदारों की भावनाएँ कभी-कभी अधूरी लगती हैं, लेकिन जैसे-जैसे कहानी अंत की तरफ बढ़ती है, फिल्म अपनी पूरी ताकत के साथ दर्शक को बाँध लेती है।

क्लाइमैक्स फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यहीं पता चलता है कि फिल्म वास्तव में किस बात पर रोशनी डालना चाहती थी—
✔️ यह कहानी किसी जिन्न या भूत की नहीं
✔️ यह कश्मीर के उन बच्चों की कहानी है, जिनका बचपन और भविष्य छीन लिया गया
✔️ यह उन परिवारों की कहानी है, जिनके घरों में हँसी की जगह चीखें रह गईं
✔️ यह उस इतिहास की कहानी है, जिसे कभी पूरी तरह कहा नहीं गया

फिल्म बताती है कि कश्मीर में घूमने वाले “भूत” आत्माएँ नहीं, बल्कि यादें हैं—ऐसी यादें, जो मिटती नहीं, सिर्फ अगली पीढ़ी में रूप बदल लेती हैं।

निर्देशक आदित्य सुहास जांभले और निर्माता आदित्य धर ने फिल्म में हॉरर को समाज और राजनीति की परतों से जोड़ा है। यह डर असल में मन का डर है—खोने का डर, मिट जाने का डर, पहचान के बिखर जाने का डर।

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