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‘देश में अघोषित आपातकाल जैसे हालात’, खरगे का मोदी सरकार पर हमला; चुनाव आयुक्तों की कानूनी सुरक्षा पर उठाए सवाल

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए देश में ‘अघोषित आपातकाल’ जैसे हालात होने का आरोप लगाया है। उन्होंने दावा किया कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान भारी पुलिस बल की तैनाती और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई से युवाओं की आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है। खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर भी निशाना साधते हुए कहा कि देश में लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

खरगे के ये बयान दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों और कथित चुनावी अनियमितताओं को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच आए। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि उनकी पार्टी लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़े मुद्दों को उठाती रहेगी। उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि संस्था को स्वतंत्र रूप से काम करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहा है।

कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी कहा कि विपक्षी नेताओं की चिंता संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों को लेकर है। हालांकि, सरकार और संबंधित संस्थाओं के खिलाफ लगाए गए इन आरोपों को कांग्रेस के राजनीतिक दावों के रूप में देखा जाना चाहिए।

खरगे ने क्यों कहा- देश में अघोषित आपातकाल जैसे हालात?

बेंगलुरु में पत्रकारों से बातचीत के दौरान मल्लिकार्जुन खरगे ने दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती और गिरफ्तारियों से सरकार के रवैये पर सवाल खड़े होते हैं।

खरगे के मुताबिक, लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना नागरिकों का अधिकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार विरोध की आवाज को दबाने का प्रयास कर रही है और युवाओं के आंदोलनों को लेकर सख्त रवैया अपना रही है।

कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा कि देश में ऐसे हालात बन रहे हैं, जिन्हें वह अघोषित आपातकाल मानते हैं। उनका कहना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति को जगह मिलनी चाहिए और नागरिकों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ‘अघोषित आपातकाल’ खरगे की ओर से इस्तेमाल किया गया राजनीतिक आरोप है। इसे देश में औपचारिक रूप से आपातकाल लागू होने के तथ्य के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए।

राहुल गांधी के साथ CJI से मुलाकात की पहल

खरगे ने कहा था कि वह कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से मिलकर संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज और चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी चिंताओं को सामने रखना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि इस संबंध में उन्होंने स्वयं पत्र लिखा था और राहुल गांधी ने भी अपनी ओर से पत्र भेजा था।

खरगे के अनुसार, प्रस्तावित मुलाकात का उद्देश्य न्यायपालिका के सामने अपनी चिंताएं रखना था। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे मुख्य न्यायाधीश से किसी विशेष कार्रवाई की मांग करने के बजाय अपनी बात रखना चाहते हैं। खरगे ने कहा था कि वे अपनी चिंताओं को विनम्रता के साथ सामने रखेंगे।

हालांकि, इस मामले में बाद में घटनाक्रम बदल गया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे का मुलाकात संबंधी अनुरोध स्वीकार नहीं किया। रिपोर्टों में बताया गया कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कुछ मुद्दे पहले से न्यायिक विचार के दायरे में थे और राजनीतिक नेताओं से इस तरह की मुलाकात न्यायिक निष्पक्षता तथा सत्ता के पृथक्करण के सिद्धांत से जुड़े सवाल खड़े कर सकती थी।

इस घटनाक्रम के बाद संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका और राजनीतिक दलों की शिकायतों को उठाने के उचित माध्यमों पर बहस तेज हुई। विपक्षी दलों के लिए अब अदालत में उपलब्ध कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए अपने आरोपों और दलीलों को प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण होगा।

चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर कांग्रेस ने उठाए सवाल

मल्लिकार्जुन खरगे ने चुनाव आयोग को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसका काम स्वतंत्र रूप से चुनाव कराना और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखना है। उनके मुताबिक, आयोग को बिना किसी राजनीतिक दबाव के काम करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

खरगे ने दावा किया कि चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर उठाई गई चिंताओं पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं हो रही है। उन्होंने कथित चुनावी अनियमितताओं और मतदाता सूची से जुड़े विवादों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन मामलों की निष्पक्ष जांच और पारदर्शी प्रक्रिया जरूरी है।

कांग्रेस अध्यक्ष ने भाजपा पर ‘वोट चोरी’ के आरोप भी लगाए। उनका दावा है कि कथित चुनावी अनियमितताओं से सत्तारूढ़ दल को राजनीतिक लाभ मिला है। हालांकि, ये आरोप कांग्रेस की ओर से लगाए गए हैं और इन्हें प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने के लिए संबंधित मामलों के ठोस साक्ष्य तथा आधिकारिक निष्कर्ष आवश्यक हैं।

चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर राजनीतिक दलों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं। ऐसे मामलों में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए आयोग के आधिकारिक जवाब, उपलब्ध चुनावी आंकड़ों और न्यायिक निर्णयों को ध्यान में रखना जरूरी है।

चुनाव आयुक्त कानून 2023 पर खरगे की आपत्ति

खरगे ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित वर्ष 2023 के कानून की भी आलोचना की। उनका विशेष विरोध इस कानून की धारा 16 में दी गई कानूनी सुरक्षा को लेकर है।

इस कानून का पूरा नाम ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023’ है। इसकी धारा 16 में प्रावधान है कि मुख्य चुनाव आयुक्त या किसी चुनाव आयुक्त के आधिकारिक कर्तव्य अथवा कार्य के निर्वहन के दौरान किए गए किसी कार्य, बात या कथन के संबंध में उनके खिलाफ दीवानी या आपराधिक कार्यवाही को अदालत स्वीकार नहीं करेगी या जारी नहीं रखेगी। यह प्रावधान आधिकारिक कर्तव्यों के दायरे में आने वाले कार्यों से संबंधित है। <Cite refs={[“turn822044search30″,”turn822044search31”]}/>

खरगे ने सवाल उठाया कि चुनाव आयुक्तों को इस तरह की कानूनी सुरक्षा क्यों दी गई है। उनका तर्क है कि इससे अधिकारियों की जवाबदेही प्रभावित हो सकती है और चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी शिकायतों पर कार्रवाई को लेकर सवाल पैदा हो सकते हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष ने राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश का उदाहरण देते हुए इस कानूनी व्यवस्था पर आपत्ति जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रावधान से चुनाव आयोग के अधिकारियों को ऐसी सुरक्षा मिलती है, जो जवाबदेही की दृष्टि से चिंताजनक है।

हालांकि, इस कानूनी प्रावधान की वास्तविक सीमा को समझना भी जरूरी है। धारा 16 आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान किए गए कार्यों से संबंधित दीवानी और आपराधिक कार्यवाही के बारे में है। इसे सभी प्रकार की जवाबदेही से पूर्ण छूट के समान बताना कानून के दायरे को जरूरत से ज्यादा व्यापक रूप में प्रस्तुत करना होगा।

EVM और वोट चोरी को लेकर भी कांग्रेस का हमला

खरगे ने चुनाव आयुक्तों को दी गई कानूनी सुरक्षा को कथित चुनावी अनियमितताओं और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) से जुड़े विवादों के साथ जोड़कर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि इस व्यवस्था से चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ियों के खिलाफ जवाबदेही सुनिश्चित करना मुश्किल हो सकता है।

कांग्रेस लंबे समय से चुनावी पारदर्शिता, मतदाता सूची और EVM से जुड़े सवाल उठाती रही है। पार्टी का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया पर जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए शिकायतों की निष्पक्ष जांच और स्पष्ट जवाब जरूरी हैं।

दूसरी ओर, EVM या चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी से संबंधित किसी भी आरोप का मूल्यांकन उपलब्ध सबूतों, तकनीकी जांच और संबंधित प्राधिकरणों की कार्रवाई के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल राजनीतिक बयान के आधार पर किसी चुनाव में धांधली होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

खरगे ने कहा कि कांग्रेस इन मुद्दों पर अपनी लड़ाई जारी रखेगी। पार्टी का जोर संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा पर है।

संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक अधिकारों पर बढ़ी बहस

खरगे के बयान ऐसे समय आए हैं, जब चुनाव आयोग की भूमिका, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), कथित वोट चोरी और विरोध प्रदर्शनों पर पुलिस की कार्रवाई को लेकर राजनीतिक बहस चल रही है।

विपक्षी दलों का कहना है कि लोकतंत्र में संस्थाओं की स्वतंत्रता और नागरिकों के विरोध करने के अधिकार की रक्षा जरूरी है। वहीं, इन मुद्दों पर किसी भी कानूनी या संवैधानिक निष्कर्ष के लिए संबंधित नियमों, संस्थागत प्रक्रियाओं और उपलब्ध तथ्यों को देखना आवश्यक है।

इस पूरे विवाद में तीन प्रमुख सवाल सामने आते हैं। पहला, विरोध प्रदर्शनों के दौरान नागरिकों के अधिकारों और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। दूसरा, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और जवाबदेही को किस तरह सुनिश्चित किया जाए। तीसरा, चुनावी अनियमितताओं से जुड़े आरोपों की जांच के लिए कौन-से कानूनी और संस्थागत रास्ते उपलब्ध हैं।

इन सवालों पर राजनीतिक दलों के अलग-अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन किसी भी आरोप की पुष्टि संबंधित साक्ष्यों और प्रक्रियाओं के आधार पर ही हो सकती है।

कांग्रेस ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखने की बात कही

मल्लिकार्जुन खरगे ने दोहराया कि कांग्रेस नागरिकों के अधिकारों और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों को उठाती रहेगी। उन्होंने कहा कि पार्टी चुनावी पारदर्शिता, लोकतांत्रिक मूल्यों और जवाबदेही के सवालों पर पीछे नहीं हटेगी।

CJI से मुलाकात का अनुरोध स्वीकार नहीं किए जाने के बाद भी चुनाव आयोग की भूमिका, चुनावी प्रक्रिया और कानूनी सुरक्षा से जुड़े मुद्दे राजनीतिक बहस का हिस्सा बने हुए हैं। कांग्रेस इन मामलों को सार्वजनिक मंचों और उपलब्ध कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए उठाने की बात कह रही है।

अब इस विवाद में आगे की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि राजनीतिक दल अपने आरोपों के समर्थन में क्या साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं, संबंधित संस्थाएं क्या जवाब देती हैं और कानूनी मंचों पर इन मुद्दों पर क्या कार्रवाई होती है।

फिलहाल, खरगे के ‘अघोषित आपातकाल’ वाले बयान और चुनाव आयुक्तों की कानूनी सुरक्षा पर उनकी आपत्तियों ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच जारी राजनीतिक बहस को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।

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