देश

Privacy Law India: मोदी सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, RTI पर असर को लेकर बड़ी बहस

Privacy Law India: भारत में नए प्राइवेसी कानून को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पारदर्शिता कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के एक समूह ने केंद्र की Narendra Modi सरकार के खिलाफ Supreme Court of India का दरवाजा खटखटाया है। उनका आरोप है कि यह नया कानून सूचना के अधिकार (RTI) को कमजोर कर सकता है और पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर नकारात्मक असर डाल सकता है।

सोमवार को इस मामले से जुड़ी चार याचिकाओं पर सुनवाई होने की उम्मीद है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार द्वारा लाया गया नया कानून पारदर्शिता को कम करेगा और आम लोगों को जरूरी जानकारी से वंचित कर सकता है।


नया कानून क्या कहता है?

यह विवाद Digital Personal Data Protection Act को लेकर है, जिसे पिछले साल लागू किया गया था। इस कानून के तहत व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है।

लेकिन इसी कानून के साथ RTI कानून में एक अहम बदलाव किया गया है। अब “व्यक्तिगत जानकारी” को सार्वजनिक करने पर रोक लगा दी गई है। पहले, यदि कोई जानकारी जनहित में जरूरी होती थी, तो उसे साझा किया जा सकता था।

यही बदलाव अब विवाद की मुख्य वजह बन गया है। आलोचकों का कहना है कि इससे सरकार के पास ज्यादा अधिकार आ जाएंगे कि वह किसी भी जानकारी को “पर्सनल” बताकर छिपा सके।


सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

इस मुद्दे को लेकर कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने Supreme Court of India में याचिका दाखिल की है। उनका तर्क है कि यह संशोधन संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।

प्रसिद्ध पारदर्शिता कार्यकर्ता Anjali Bhardwaj ने कहा कि इस कानून का इस्तेमाल सरकार उन जानकारियों को छिपाने के लिए कर सकती है, जो जनता के हित में बेहद जरूरी होती हैं। उदाहरण के तौर पर, किसी खराब निर्माण कार्य में शामिल अधिकारियों या ठेकेदारों के नाम भी अब सार्वजनिक नहीं किए जा सकते।


“लोकतंत्र के लिए खतरा” क्यों कहा जा रहा है?

RTI कार्यकर्ता Venkatesh Nayak ने इस बदलाव को “भागीदारी वाले लोकतंत्र के लिए खतरा” बताया है। उनका कहना है कि यह कानून सरकार की जवाबदेही को कम कर सकता है और पारदर्शिता को नुकसान पहुंचा सकता है।

उनके अनुसार, अगर जनता को सही जानकारी नहीं मिलेगी, तो वह सरकार के फैसलों पर सवाल नहीं उठा पाएगी। इससे लोकतंत्र की नींव कमजोर हो सकती है।


सरकार का पक्ष क्या है?

वहीं, सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है। सरकार का कहना है कि RTI कानून अभी भी “अधिकतम जानकारी और न्यूनतम अपवाद” के सिद्धांत पर काम करता है।

केंद्रीय आईटी मंत्री Ashwini Vaishnaw ने संसद में कहा था कि यह नया कानून लोगों की निजता और सूचना के अधिकार के बीच संतुलन बनाने के लिए लाया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इससे जरूरी जानकारी के खुलासे पर कोई रोक नहीं लगेगी।


पत्रकारों और मीडिया की चिंता

इस कानून को लेकर पत्रकारों और मीडिया संगठनों में भी चिंता बढ़ रही है। Editors Guild of India ने कहा है कि यह कानून पत्रकारिता पर “चिलिंग इफेक्ट” डाल सकता है।

मीडिया संगठनों का कहना है कि नए नियमों के तहत रिपोर्टिंग करने के लिए हर व्यक्ति या कंपनी से अनुमति लेनी पड़ सकती है। इससे खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) मुश्किल हो जाएगी और कई महत्वपूर्ण खबरें सामने नहीं आ पाएंगी।


अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग पर असर

भारत की प्रेस स्वतंत्रता को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। Reporters Without Borders की वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की रैंकिंग पिछले साल 180 देशों में 151 रही थी।

रिपोर्ट में पत्रकारों के खिलाफ हिंसा, मीडिया पर नियंत्रण और राजनीतिक दबाव जैसे मुद्दों को चिंता का कारण बताया गया था। ऐसे में नया कानून इस स्थिति को और प्रभावित कर सकता है।


डिजिटल कंपनियों पर सख्ती

इस कानून में सोशल मीडिया और टेक कंपनियों के लिए भी सख्त प्रावधान किए गए हैं। नियमों का पालन न करने पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है, जो करोड़ों डॉलर तक हो सकता है।

हालांकि, पत्रकारों को इसमें कोई विशेष छूट नहीं दी गई है, जो मीडिया संगठनों के लिए चिंता का विषय है। उनका कहना है कि इससे रिपोर्टिंग के दौरान आत्म-सेंसरशिप बढ़ सकती है।


अन्य देशों से तुलना

ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में इस तरह के कानूनों में पत्रकारों को कुछ छूट दी जाती है। लेकिन भारत में ऐसा प्रावधान नहीं है।

The Reporters’ Collective ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है और कहा है कि यह कानून पत्रकारों और आम नागरिकों दोनों के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है।


आगे क्या होगा?

इस मामले की सुनवाई Supreme Court of India में शुरू हो रही है और इसमें अंतिम फैसला आने में कई महीने लग सकते हैं।

यह मामला सिर्फ एक कानून का नहीं, बल्कि देश में पारदर्शिता, निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संतुलन का है। आने वाले समय में कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि भारत में सूचना का अधिकार किस दिशा में जाएगा।


निष्कर्ष

नया प्राइवेसी कानून एक तरफ जहां लोगों के डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने का दावा करता है, वहीं दूसरी तरफ यह पारदर्शिता और पत्रकारिता की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।

Narendra Modi सरकार और याचिकाकर्ताओं के बीच यह कानूनी लड़ाई आने वाले समय में एक बड़ा उदाहरण बन सकती है, जो तय करेगी कि लोकतंत्र में सूचना और निजता के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।

Related Articles

Back to top button