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Yamuna River Pollution Delhi: दिल्ली की यमुना फिर बनी झाग की चादर

Yamuna River Pollution Delhi: दिल्ली की यमुना नदी, जो राजधानी की लगभग 70 प्रतिशत पानी की जरूरतों को पूरा करती है, आज गंभीर संकट से गुजर रही है। कभी स्वच्छ और पवित्र मानी जाने वाली यह नदी अब सफेद जहरीले झाग से ढकी नजर आती है। वजीराबाद से ओखला तक फैला यह झाग अब आम नजारा बन चुका है।

हर साल सर्दियों और मानसून के बाद यह समस्या और गहरी हो जाती है। बढ़ती आबादी, औद्योगिक कचरा और बिना शोधन का सीवेज यमुना को धीरे-धीरे बीमार बना रहा है। यह सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि लाखों लोगों के स्वास्थ्य और आजीविका से भी जुड़ा हुआ है।

यमुना में झाग क्यों बनता है?

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार यमुना में बनने वाला सफेद झाग कई जहरीले रसायनों का नतीजा है। इसमें डिटर्जेंट से निकलने वाले फॉस्फेट, औद्योगिक कचरे में मौजूद केमिकल, अमोनिया और बिना ट्रीट किया गया गंदा पानी शामिल होता है।

दिल्ली के कई इलाकों से दर्जनों नाले सीधे यमुना में गिरते हैं। इन नालों में घरेलू कचरा, फैक्ट्री का वेस्ट और सीवर का पानी बिना किसी सफाई के नदी में पहुंच जाता है।

जब मानसून के बाद नदी में पानी का बहाव कम हो जाता है, तब ये जहरीले तत्व जमा होने लगते हैं। इनके आपसी रासायनिक रिएक्शन से झाग बनता है, जो धीरे-धीरे पूरी सतह पर फैल जाता है।

जलीय जीवन पर पड़ रहा है घातक असर

यमुना में बढ़ता प्रदूषण सबसे ज्यादा नुकसान जलीय जीवों को पहुंचा रहा है। जहरीले रसायनों की वजह से पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, जिससे मछलियां और अन्य जीव दम घुटने से मरने लगते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में मछलियों की मौत की घटनाएं सामने आई हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि दिल्ली के कई हिस्सों में यमुना अब “इकोलॉजिकल डेड ज़ोन” यानी लगभग मृत नदी बन चुकी है।

इससे उन परिवारों पर सीधा असर पड़ा है, जो पीढ़ियों से मछली पकड़कर अपना जीवनयापन करते आए हैं।

मछुआरों की जिंदगी पर संकट

60 वर्षीय लखिंदर साहनी जैसे कई मछुआरे आज मुश्किल हालात में जी रहे हैं। वे पिछले कई सालों से यमुना किनारे रहकर मछली पकड़ने का काम करते हैं।

उनका कहना है कि सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च किए, लेकिन झाग आज भी नहीं रुका। अब हालात ऐसे हैं कि उन्हें नदी के पानी में नहाने तक से डर लगता है। वे बाहर से पानी खरीदकर इस्तेमाल करते हैं।

मानसून के समय जब नदी में ताजा पानी आता है, तब थोड़ी राहत मिलती है और मछलियां फिर से पनपने लगती हैं। लेकिन यह राहत कुछ महीनों तक ही रहती है।

स्वास्थ्य के लिए बढ़ता खतरा

यमुना का प्रदूषण सिर्फ पर्यावरण को ही नहीं, बल्कि लोगों की सेहत को भी नुकसान पहुंचा रहा है। झाग के संपर्क में आने से त्वचा रोग, सांस की समस्या, एलर्जी और कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।

नदी किनारे रहने वाले लोग रोज इस प्रदूषित माहौल में सांस लेते हैं। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका असर सबसे ज्यादा पड़ रहा है।

डॉक्टरों का मानना है कि लंबे समय तक इस प्रदूषण के संपर्क में रहने से फेफड़ों और त्वचा से जुड़ी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।

राजनीतिक और प्रशासनिक उलझन

यमुना की सफाई की जिम्मेदारी कई एजेंसियों में बंटी हुई है। केंद्र सरकार, राज्य सरकार, नगर निगम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जल प्राधिकरण सभी इसमें शामिल हैं।

पिछले कई दशकों में कई योजनाएं बनीं। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए, सफाई अभियान चले और निगरानी समितियां बनीं। लेकिन इन योजनाओं का असर जमीन पर बहुत कम दिखा।

कई बार त्योहारों या बड़े आयोजनों के समय नदी थोड़ी साफ नजर आती है, लेकिन कुछ ही हफ्तों में हालात फिर बिगड़ जाते हैं। इससे साफ पता चलता है कि ज्यादातर कदम अस्थायी होते हैं।

बेंगलुरु मॉडल से क्या सीख सकता है दिल्ली?

बेंगलुरु की बेलंदूर और वर्थुर झीलों में भी पहले इसी तरह झाग की समस्या थी। वहां सरकार ने स्थायी समाधान पर काम किया।

वेस्ट वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट को अपग्रेड किया गया, जहरीली गाद हटाई गई, झीलों में बैरियर लगाए गए और लोगों को जागरूक किया गया।

इन उपायों से धीरे-धीरे हालात सुधरे। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर दिल्ली भी इसी तरह लंबी अवधि की योजना पर काम करे, तो यमुना को बचाया जा सकता है।

दिल्ली में क्यों नहीं दिख रहा सुधार?

दिल्ली में अब तक ज्यादातर काम दिखावे तक सीमित रहा है। कुछ जगहों पर नावों से झाग तोड़ा जाता है, लेकिन इससे समस्या जड़ से खत्म नहीं होती।

असल जरूरत है बड़े नालों की गहरी सफाई, औद्योगिक कचरे पर सख्त नियंत्रण और अवैध सीवेज कनेक्शन को बंद करने की।

स्थानीय लोगों का मानना है कि जब तक गंदा पानी नदी में जाना बंद नहीं होगा, तब तक झाग बनता रहेगा।

यमुना की हालत: एक चेतावनी

आज यमुना का हाल पूरे देश के लिए चेतावनी है। यह बताता है कि बिना योजना के शहरीकरण और उद्योग विकास कितना खतरनाक हो सकता है।

यमुना सिर्फ पानी का स्रोत नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और परंपरा से जुड़ी हुई है। छठ पूजा, यमुना आरती और कई धार्मिक आयोजन इसी नदी से जुड़े हैं।

अगर इसे नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

निष्कर्ष: क्या अब भी बच सकती है यमुना?

यमुना की हालत गंभीर जरूर है, लेकिन अभी भी देर नहीं हुई है। अगर सरकार, उद्योग, आम नागरिक और प्रशासन मिलकर ईमानदारी से काम करें, तो नदी को फिर से जीवित किया जा सकता है।

इसके लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, सख्त कानून और जनता की भागीदारी जरूरी है।

यमुना को बचाना सिर्फ पर्यावरण की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

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