
Budget 2026 News: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार आगामी केंद्रीय बजट में आर्थिक विकास को रफ्तार देने के साथ-साथ राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने पर जोर दे सकती है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार Ease of Doing Business यानी कारोबार को आसान बनाने से जुड़े कई अहम कदमों की घोषणा कर सकती है, वहीं बुनियादी ढांचे पर खर्च को भी और बढ़ाया जा सकता है।
यह नीति दिशा ऐसे समय सामने आ रही है, जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बनी हुई है। अमेरिका द्वारा लगाए गए सख्त टैरिफ, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और विदेशी पूंजी के बहिर्गमन ने भारत की आर्थिक संभावनाओं पर दबाव बढ़ाया है।
1 फरवरी को पेश होगा बजट, सार्वजनिक खर्च पर रहेगा जोर
1 फरवरी को पेश होने वाले केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सार्वजनिक खर्च को प्राथमिकता देने की उम्मीद जताई जा रही है। निजी निवेश फिलहाल कमजोर बना हुआ है, जिसका एक बड़ा कारण कंपनियों की सुस्त कमाई और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली को माना जा रहा है।
ऐसे में सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी निवेश के जरिए आर्थिक गतिविधियों को गति देने की रणनीति अपना सकती है, ताकि मांग को सहारा मिले और रोजगार के अवसर पैदा हों।
छोटे कारोबारियों को राहत देने की तैयारी
रिपोर्ट के मुताबिक, बजट में आयात शुल्क व्यवस्था को सरल बनाने और छोटे कारोबारियों के लिए अनुपालन नियमों को आसान करने की दिशा में भी कदम उठाए जा सकते हैं। इससे MSME सेक्टर को राहत मिलने की संभावना है, जो देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि टैक्स और नियमों का बोझ कम किया जाता है, तो इससे छोटे उद्यमों को विस्तार का मौका मिलेगा और निजी निवेश को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।
‘विकास और मजबूती दोनों पर फोकस’: अर्थशास्त्री
ब्लूमबर्ग से बातचीत में क्रिसिल लिमिटेड के मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी ने कहा कि आने वाला बजट विकास और आर्थिक मजबूती, दोनों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा। उनके मुताबिक सरकार का जोर वित्तीय अनुशासन बनाए रखने, सुधारों का स्पष्ट संकेत देने और निजी निवेश को बढ़ावा देने पर रहेगा।
उन्होंने कहा कि निजी निवेश को आंशिक रूप से सुधारों और आंशिक रूप से प्रोत्साहनों के जरिए गति देने की कोशिश की जाएगी।
इंफ्रास्ट्रक्चर पर रिकॉर्ड खर्च संभव
विश्लेषकों के अनुमान के अनुसार, इस बार के बजट में पूंजीगत व्यय यानी कैपेक्स का आंकड़ा 12 लाख करोड़ रुपये के पार जा सकता है। यह मौजूदा वित्त वर्ष के अनुमानित 11.2 लाख करोड़ रुपये से अधिक होगा।
इस खर्च का बड़ा हिस्सा सड़कों, बंदरगाहों और ऊर्जा से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर किया जा सकता है। इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश को लंबे समय से आर्थिक विकास का मजबूत आधार माना जाता है, क्योंकि इससे कई सेक्टरों में मांग और रोजगार दोनों बढ़ते हैं।
रक्षा बजट में भी बढ़ोतरी की संभावना
पिछले वर्ष पाकिस्तान के साथ हुए सैन्य तनाव के बाद रक्षा क्षेत्र में खर्च बढ़ने की भी संभावना जताई जा रही है। सुरक्षा जरूरतों और रणनीतिक मजबूती को ध्यान में रखते हुए सरकार रक्षा बजट में अतिरिक्त आवंटन कर सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक हालात में रक्षा खर्च बढ़ाना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हो सकता है।
राजकोषीय घाटे पर नहीं होगा समझौता
हालांकि खर्च बढ़ाने के बावजूद सरकार राजकोषीय अनुशासन से पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रही है। विश्लेषकों का अनुमान है कि अगले वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य GDP का लगभग 4.2 प्रतिशत रखा जा सकता है।
सरकार का दीर्घकालिक लक्ष्य 2030-31 तक सरकारी कर्ज को GDP के 50 प्रतिशत (प्लस-माइनस 1 प्रतिशत) तक सीमित करना है। यही वजह है कि खर्च और आय के बीच संतुलन बनाए रखना सरकार के लिए बड़ी चुनौती रहेगा।
खर्च के लिए कहां से आएगा पैसा?
उच्च खर्च को पूरा करने के लिए सरकार को भारतीय रिजर्व बैंक और अन्य वित्तीय संस्थानों से मिलने वाले डिविडेंड पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ सकता है। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, इस साल ये भुगतान करीब 3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
वहीं, सरकारी परिसंपत्तियों की बिक्री से करीब 50 हजार करोड़ रुपये जुटने का अनुमान है, जिससे संकेत मिलता है कि विनिवेश की रफ्तार फिलहाल सुस्त रह सकती है।
चुनावी राज्यों पर भी नजर?
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता भले ही मजबूत बनी हुई हो, लेकिन बजट के जरिए तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे चुनावी राज्यों को साधने की कोशिश की जा सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार पहले भी चुनावी राज्यों पर विशेष ध्यान देती रही है। ग्लोबलडाटा टीएस लोम्बार्ड की मुख्य अर्थशास्त्री शुमिता देवेश्वर के अनुसार, अगर इस बार भी ऐसा हुआ तो इसमें कोई हैरानी नहीं होगी।
निवेशकों और बाजार के लिए क्या संकेत?
कुल मिलाकर, बजट 2025 से यह संकेत मिल रहे हैं कि सरकार विकास को गति देने के लिए खर्च बढ़ाएगी, लेकिन साथ ही वित्तीय अनुशासन बनाए रखने की कोशिश भी करेगी। बाजार और निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार सुधारों और प्रोत्साहनों के बीच किस तरह संतुलन बनाती है।



