
US-Pakistan Military Exercise: अमेरिका और पाकिस्तान के बीच हुए एक संयुक्त सैन्य अभ्यास ने भारत की राजनीति में हलचल मचा दी है। दोनों देशों की सेनाओं ने ‘इंस्पायर्ड गैम्बिट 2026’ नामक संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण अभ्यास को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। यह अभ्यास पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में स्थित पब्बी के नेशनल काउंटर टेररिज़्म सेंटर में आयोजित किया गया, जो 8 जनवरी से 16 जनवरी तक चला। इस घटनाक्रम के सामने आते ही भारत में विपक्षी दल कांग्रेस ने केंद्र की मोदी सरकार की विदेश नीति पर तीखा हमला बोला है।
दो हफ्ते तक चले इस सैन्य अभ्यास में अमेरिकी और पाकिस्तानी सैनिकों ने मिलकर आधुनिक युद्ध कौशल, पैदल सेना की रणनीति, सामरिक तालमेल और आतंकवाद विरोधी अभियानों से जुड़ा प्रशिक्षण लिया। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (Centcom) की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया कि इस तरह के संयुक्त अभ्यास दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा संबंधों को और मज़बूत करते हैं।
Centcom ने अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि अभ्यास का मुख्य उद्देश्य संयुक्त इन्फैंट्री स्किल्स, सामरिक रणनीतियों और काउंटर टेररिज़्म ऑपरेशन्स में आपसी सहयोग को बढ़ाना था। इस बयान को ऐसे समय में जारी किया गया है जब अमेरिका और पाकिस्तान के रक्षा संबंधों में फिर से नज़दीकी के संकेत दिख रहे हैं।
पाकिस्तानी अख़बार ‘डॉन’ की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और पाकिस्तान के बीच सैन्य से सैन्य संबंधों में हाल के महीनों में उल्लेखनीय मजबूती आई है। इसमें न सिर्फ संयुक्त प्रशिक्षण अभ्यास शामिल हैं, बल्कि बड़े रक्षा सौदे और दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच सकारात्मक बयानबाज़ी भी देखी जा रही है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व, खासतौर पर फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के लिए दिए गए गर्मजोशी भरे बयान इस बढ़ती नज़दीकी की ओर इशारा करते हैं। यह घटनाक्रम भारत के लिए रणनीतिक रूप से संवेदनशील माना जा रहा है।
इस पूरे मामले पर भारत में राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज़ हो गई है। कांग्रेस ने इसे मोदी सरकार की विदेश नीति की “वास्तविकता” करार दिया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पार्टी के संचार प्रभारी जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका-पाकिस्तान का यह सैन्य सहयोग मोदी सरकार के उस दावे को कमजोर करता है, जिसमें भारत को वैश्विक मंच पर निर्णायक ताकत बताया जाता है।
जयराम रमेश ने कहा कि खुद को “विश्वगुरु” बताने वाली सरकार की कूटनीति को एक और झटका लगा है। उन्होंने अमेरिकी सेंट्रल कमांड के बयान का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका और पाकिस्तान की सेनाओं द्वारा संयुक्त सैन्य अभ्यास पूरा किया जाना इस बात का संकेत है कि वॉशिंगटन और इस्लामाबाद के रिश्ते पहले से कहीं ज़्यादा मजबूत हो रहे हैं।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि जून 2025 में अमेरिकी सेंट्रल कमांड के तत्कालीन प्रमुख जनरल माइकल कुरिल्ला ने पाकिस्तान को आतंकवाद विरोधी अभियानों में “बेहद प्रभावी और भरोसेमंद साझेदार” बताया था। कांग्रेस का कहना है कि ऐसे बयान भारत की सुरक्षा चिंताओं को नज़रअंदाज़ करने वाले हैं।
जयराम रमेश ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों का ज़िक्र करते हुए कहा कि ट्रंप ने कई मौकों पर पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की खुलकर प्रशंसा की है। उन्होंने आरोप लगाया कि आसिम मुनीर के भड़काऊ और सांप्रदायिक बयानों के बाद ही अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमलों की पृष्ठभूमि तैयार हुई थी।
कांग्रेस नेता ने यह भी दावा किया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद यह स्वीकार किया है कि उन्होंने 10 मई 2025 को भारत द्वारा शुरू किए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को रुकवाने में हस्तक्षेप किया था। कांग्रेस का कहना है कि यह बयान भारत की सैन्य और कूटनीतिक स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और पाकिस्तान के बीच बढ़ती सैन्य नज़दीकी भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती बन सकती है, खासकर ऐसे समय में जब भारत लगातार यह दावा करता रहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय आतंकवाद के मुद्दे पर उसके साथ मजबूती से खड़ा है।
डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, ‘इंस्पायर्ड गैम्बिट 2026’ अभ्यास का समय भी काफी महत्वपूर्ण है। अमेरिका और पाकिस्तान दोनों ही देश आतंकवाद विरोधी सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर अपने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं। अफगानिस्तान की स्थिति और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच यह साझेदारी और भी अहम मानी जा रही है।
हालांकि भारत सरकार की ओर से इस सैन्य अभ्यास पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन कांग्रेस के हमलों ने इस मुद्दे को घरेलू राजनीति के केंद्र में ला दिया है। विपक्ष का कहना है कि मोदी सरकार की “आक्रामक और आत्मप्रचार आधारित विदेश नीति” ज़मीनी सच्चाइयों से मेल नहीं खाती।
वहीं सत्तारूढ़ दल के समर्थक इसे अमेरिका की रणनीतिक मजबूरी बताते हैं और कहते हैं कि भारत-अमेरिका संबंध अब भी मजबूत हैं। लेकिन इतना साफ है कि अमेरिका-पाकिस्तान सैन्य अभ्यास ने भारत में राजनीतिक बहस को नई दिशा दे दी है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और क्या अमेरिका-पाकिस्तान की यह नज़दीकी भारत की विदेश नीति को नए सिरे से सोचने पर मजबूर करेगी।



