
India China WTO dispute: भारत और चीन के बीच एक बार फिर व्यापारिक तनाव गहराता नजर आ रहा है। इस बार मामला विश्व व्यापार संगठन (WTO) तक पहुंच गया है। चीन ने भारत के खिलाफ औपचारिक रूप से शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें उसने भारत द्वारा लगाए गए सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) उत्पादों पर टैरिफ और सोलर सेक्टर से जुड़ी सब्सिडी को WTO नियमों का उल्लंघन बताया है।
चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने शुक्रवार को जारी एक आधिकारिक बयान में कहा कि भारत की ये नीतियां उसके घरेलू उद्योगों को अनुचित लाभ पहुंचाती हैं और इससे चीनी कंपनियों के हितों को नुकसान हो रहा है। चीन का आरोप है कि भारत की ये नीतियां वैश्विक व्यापार नियमों के खिलाफ हैं और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर रही हैं।
WTO में क्यों पहुंचा भारत-चीन विवाद
दरअसल, भारत पिछले कुछ वर्षों से अपने मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियानों के तहत घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रहा है। इसके लिए सरकार ने कई सेक्टर्स में आयात शुल्क बढ़ाया और स्थानीय कंपनियों को प्रोत्साहन देने के लिए सब्सिडी योजनाएं लागू कीं।
चीन का कहना है कि भारत द्वारा ICT उत्पादों जैसे नेटवर्किंग इक्विपमेंट, टेलीकॉम डिवाइसेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान पर लगाए गए टैरिफ WTO के तहत तय किए गए नियमों के अनुरूप नहीं हैं। इसके अलावा, भारत द्वारा अपने फोटोवोल्टिक यानी सोलर पैनल उद्योग को दी जा रही सब्सिडी को भी चीन ने अनुचित बताया है।
चीन का आरोप: भारतीय उद्योगों को मिल रहा अनुचित फायदा
चीन के वाणिज्य मंत्रालय के बयान में साफ कहा गया है कि भारत की ये नीतियां उसके घरेलू उद्योगों को “अनफेयर कॉम्पिटिटिव एडवांटेज” यानी अनुचित प्रतिस्पर्धात्मक लाभ देती हैं। मंत्रालय के अनुसार, इससे न केवल चीनी कंपनियों को नुकसान हो रहा है, बल्कि वैश्विक बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा भी प्रभावित हो रही है।
बयान में यह भी कहा गया कि भारत की ये नीतियां WTO के तहत किए गए समझौतों और प्रतिबद्धताओं के खिलाफ हैं। चीन ने भारत से अपील की है कि वह अपने इन “गलत तरीकों” को तुरंत सुधारे और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों का पालन करे।
भारत की सोलर नीति पर चीन की आपत्ति
भारत पिछले कुछ वर्षों में नवीकरणीय ऊर्जा, खासकर सोलर एनर्जी पर बड़ा दांव लगा रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि देश में सोलर पैनलों का निर्माण घरेलू स्तर पर हो और आयात पर निर्भरता कम की जाए।
इसके लिए सरकार ने प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम, आयात शुल्क और अन्य वित्तीय सहायता योजनाएं लागू की हैं। चीन, जो दुनिया में सोलर पैनल निर्माण का सबसे बड़ा खिलाड़ी है, भारत की इन नीतियों से सीधे प्रभावित हो रहा है।
चीन का कहना है कि भारत की सोलर सब्सिडी योजनाएं WTO के सब्सिडी और काउंटरवेलिंग उपायों से जुड़े नियमों का उल्लंघन करती हैं और इससे भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजार में अतिरिक्त फायदा मिल रहा है।
ICT उत्पादों पर टैरिफ बना विवाद की बड़ी वजह
ICT सेक्टर में भारत ने कई उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाया है, ताकि घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिल सके। इसमें नेटवर्किंग इक्विपमेंट, मोबाइल से जुड़े कंपोनेंट्स और अन्य डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर उत्पाद शामिल हैं।
चीन का आरोप है कि ये टैरिफ WTO के तहत तय अधिकतम सीमा से ज्यादा हैं और इससे चीनी निर्यातकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसी मुद्दे को लेकर चीन ने अब WTO में औपचारिक विवाद दर्ज कराया है।
WTO में आगे क्या होगा?
WTO की विवाद निपटान प्रक्रिया के तहत, अब दोनों देशों के बीच पहले परामर्श (Consultations) की प्रक्रिया शुरू होगी। अगर इस दौरान कोई समाधान नहीं निकलता है, तो मामला डिस्प्यूट सेटलमेंट पैनल के पास जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद लंबा खिंच सकता है, क्योंकि भारत और चीन दोनों ही अपने-अपने आर्थिक हितों को लेकर काफी सख्त रुख अपनाए हुए हैं। साथ ही, WTO की विवाद निपटान प्रणाली पहले से ही कई मामलों में देरी के लिए जानी जाती है।
भारत का संभावित पक्ष क्या हो सकता है?
भारत की ओर से अभी इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, नीति विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अपनी नीतियों को राष्ट्रीय सुरक्षा, घरेलू उद्योग संरक्षण और ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन से जोड़कर पेश कर सकता है।
भारत पहले भी WTO में यह दलील देता रहा है कि विकासशील देशों को अपने उद्योगों को मजबूत करने के लिए कुछ विशेष नीतिगत छूट मिलनी चाहिए। इसके अलावा, भारत यह भी तर्क दे सकता है कि उसकी सोलर सब्सिडी जलवायु परिवर्तन से निपटने के वैश्विक प्रयासों का हिस्सा है।
भारत-चीन व्यापार संबंधों पर असर
यह विवाद ऐसे समय पर सामने आया है, जब भारत और चीन के बीच पहले से ही कई मोर्चों पर तनाव बना हुआ है। सीमा विवाद, निवेश प्रतिबंध और ऐप बैन जैसे मुद्दों के बाद अब व्यापारिक मोर्चे पर भी टकराव साफ नजर आ रहा है।
चीन भारत का एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है, लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा लंबे समय से भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। भारत लगातार चीनी आयात पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है, जबकि चीन इसे व्यापार नियमों के उल्लंघन के रूप में देख रहा है।
ग्लोबल ट्रेड के लिए क्यों अहम है यह मामला
विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला सिर्फ भारत और चीन तक सीमित नहीं है। अगर WTO इस पर कोई अहम फैसला देता है, तो उसका असर अन्य विकासशील देशों की औद्योगिक और सोलर नीतियों पर भी पड़ सकता है।
कई देश अपने घरेलू उद्योगों को बचाने के लिए टैरिफ और सब्सिडी का सहारा ले रहे हैं। ऐसे में यह केस भविष्य के वैश्विक व्यापार नियमों की दिशा तय कर सकता है।
आने वाले समय में बढ़ सकता है दबाव
फिलहाल इतना तय है कि WTO में यह मामला भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। हालांकि, भारत पहले भी WTO में कई मामलों में मजबूती से अपना पक्ष रख चुका है।
अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि भारत इस आरोप का कैसे जवाब देता है और क्या दोनों देश किसी समझौते पर पहुंच पाते हैं या फिर यह विवाद लंबे कानूनी संघर्ष में बदल जाता है।



