
दक्षिण अफ़्रीका ने जोहानेसबर्ग में आयोजित G20 शिखर सम्मेलन में वह कर दिखाया जिसकी कई देशों को उम्मीद नहीं थी। दो दिन तक चले इस सम्मेलन में कई बड़े मतभेद सामने आए—सबसे बड़ा मतभेद था संयुक्त राज्य अमेरिका का खुला विरोध और उसका बैठक में हिस्सा न लेना। इसके बावजूद दक्षिण अफ्रीका ने वह ऐतिहासिक Leaders’ Declaration पारित करा ली, जिसके केंद्र में जलवायु परिवर्तन, ऋण राहत और वैश्विक असमानता जैसे मुद्दे थे। राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने इस घोषणा पत्र को “बहुपक्षीय सहयोग के प्रति नए संकल्प” का प्रतीक बताया।
अमेरिका का बहिष्कार और कड़ा विरोध
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस शिखर सम्मेलन को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया। उनका आरोप था कि दक्षिण अफ्रीका की अश्वेत-नेतृत्व वाली सरकार देश में गोरे अल्पसंख्यकों को निशाना बना रही है। यह दावा पहले भी विवादों में रहा है, और एक बार फिर इससे दोनों देशों के बीच तनाव गहरा गया।
ट्रम्प प्रशासन ने दक्षिण अफ्रीका के एजेंडे का विरोध करते हुए कहा कि जलवायु कार्रवाई, स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों और गरीब देशों के कर्ज़ बोझ को कम करने जैसे मुद्दों पर वह सहमत नहीं हो सकता। सम्मेलन शुरू होने से पहले ही ट्रम्प ने इन मुद्दों को “अवास्तविक और गैर-जरूरी” बताते हुए खारिज कर दिया था।
इसके बावजूद, रामाफोसा ने दुनिया के कई प्रमुख देशों से समर्थन जुटाया और वह भाषा शामिल करवाई जिसे वाशिंगटन लंबे समय से टालता आया है—खासकर महत्वाकांक्षी अक्षय ऊर्जा लक्ष्य और कम आय वाले देशों पर बढ़ते कर्ज़ बोझ पर ठोस चिंताओं का उल्लेख।
घोषणा पत्र ने क्या कहा?
घोषणा पत्र में तीन मुख्य मुद्दों पर जोर दिया गया:
-
जलवायु परिवर्तन को गंभीर वैश्विक खतरे के रूप में स्वीकार करना
-
नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए तेज़ और तत्काल कदम उठाना
-
गरीब देशों पर बढ़ते कर्ज़ भार को कम करने के लिए वैश्विक सहयोग मजबूत करना
रामाफोसा का कहना था कि यह घोषणा दिखाती है कि दुनिया अब भी साझा लक्ष्यों पर एकमत हो सकती है। समापन समारोह में उन्होंने कहा,
“यह घोषणा साबित करती है कि हमारे साझा उद्देश्य हमारे मतभेदों से कहीं बड़े हैं।”
अर्जेंटीना भी हुआ विपक्ष में, माइलि की गैरहाज़िरी
अकेला अमेरिका ही नहीं, अर्जेंटीना ने भी घोषणा पत्र का विरोध किया। अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर माइलि, जो ट्रम्प के करीबी माने जाते हैं, बैठक में शामिल ही नहीं हुए। उनकी अनुपस्थिति और विरोध ने इस घोषणा को और अधिक प्रतीकात्मक बना दिया, क्योंकि इसके बावजूद अफ्रीकी महाद्वीप का नेतृत्व अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में सफल रहा।
यूक्रेन और जलवायु पर वैश्विक विभाजन
जोहानेसबर्ग सम्मेलन ऐसे समय में हुआ जब दुनिया पहले से ही कई भू-राजनीतिक तनावों से गुजर रही है। रूस–यूक्रेन युद्ध पर कई देशों की नजर थी, लेकिन घोषणा पत्र में इस पर केवल एक छोटी और सामान्य टिप्पणी की गई। इससे यूक्रेन पर अधिक कड़ा बयान चाहने वाले देशों को निराशा हुई।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अफ्रीकी महाद्वीप पर पहली बार हुए इस शिखर सम्मेलन को ऐतिहासिक बताया, लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि दुनिया अभी भी बड़े मुद्दों पर एकजुट नहीं हो पा रही है।
उन्होंने कहा,
“अफ्रीकी धरती पर G20 का आना एक माइलस्टोन है, लेकिन भू-राजनीतिक संकटों पर साझा रुख बनाने में हमें अभी लंबा सफ़र तय करना है।”
G20 नेतृत्व हस्तांतरण पर अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका में विवाद
शिखर सम्मेलन के दौरान एक और विवाद तब शुरू हुआ जब दक्षिण अफ्रीका ने G20 अध्यक्षता के औपचारिक हस्तांतरण के लिए अमेरिका द्वारा भेजे गए प्रतिनिधि को “अपर्याप्त स्तर” का बताते हुए अस्वीकार कर दिया। वर्ष 2026 में अमेरिका G20 की मेजबानी करेगा और उसने इस बार हस्तांतरण प्रक्रिया के लिए एक जूनियर अधिकारी भेजा था।
दक्षिण अफ्रीका का कहना था कि यह एक “लीडर्स समिट” है और इसलिए प्रतिनिधि का स्तर राष्ट्रपति, विशेष दूत या कम से कम किसी मंत्री का होना चाहिए। विदेश मंत्री रॉनल्ड लामोला ने स्पष्ट कहा,
“हमें प्रक्रिया में सम्मान बनाए रखना होगा। यह सिर्फ औपचारिकता नहीं है।”
इसके जवाब में व्हाइट हाउस ने दक्षिण अफ्रीका की आलोचना की। प्रेस सचिव कैरोलाइन लेविट ने कहा कि रामाफोसा “अमेरिका और उसके राष्ट्रपति के बारे में अनावश्यक टिप्पणियां कर रहे हैं।” दोनों देशों के बीच यह नया विवाद कूटनीतिक खिंचाव को और बढ़ा रहा है।
वैश्विक दक्षिण के लिए बड़ी प्रतीकात्मक जीत
हालांकि सम्मेलन कई राजनीतिक तनावों से घिरा रहा, सामाजिक और मानवीय संगठनों ने दक्षिण अफ्रीका की पहल की सराहना की। उन्हें लगा कि पहली बार असमानता जैसी समस्या को G20 की केंद्रीय चर्चा बनाया गया।
ऑक्सफैम के मैक्स लॉसन ने कहा,
“यह पहली बार है जब विश्व नेताओं की बैठक में असमानता के संकट को केंद्र में रखा गया है। यह वैश्विक दक्षिण के लिए महत्वपूर्ण जीत है।”
नामीबिया की राष्ट्रपति नेटुम्बो नांदी-नदैतवाह ने भी अफ्रीकी दृष्टिकोण को महत्व दिए जाने की प्रशंसा की। उन्होंने कहा,
“विकास को अफ्रीका की नज़र से समझने की जरूरत को अब दुनिया महसूस करने लगी है।”
समग्र रूप से, भले ही सम्मेलन ने भू-राजनीतिक मुद्दों पर कोई बड़ा समाधान पेश नहीं किया, लेकिन यह स्पष्ट है कि दक्षिण अफ्रीका ने दुनिया को दिखा दिया कि अफ्रीका की आवाज़ अब वैश्विक मंचों पर नई ताकत से उभर रही है। इस G20 घोषणा ने यह भी दर्शाया कि वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताएं अब अनदेखी नहीं की जा सकतीं—चाहे दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्था ही क्यों न विरोध में खड़ी हो।



