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Infosys Narayana Murthy के 70 घंटे काम वाले बयान पर मोहनदास पाई की सफाई: जानें असली मतलब

Infosys Narayana Murthy 70 hours: Infosys के सह-संस्थापक N.R.Narayana Murthy द्वारा युवाओं को अधिक घंटे काम करने की सलाह देने वाला बयान पिछले कुछ समय से देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। सोशल मीडिया से लेकर कॉर्पोरेट जगत तक, इस टिप्पणी ने कई तरह की प्रतिक्रियाएं जन्म दीं। हालांकि, हाल ही में आरिन कैपिटल के चेयरमैन और इंफोसिस के पूर्व सीएफओ मोहनदास पाई ने इस पूरे विवाद पर अपनी राय रखते हुए कहा कि मूर्ति के बयान को गलत तरीके से समझा गया।

पाई के अनुसार, नारायण मूर्ति का संदेश आम नौकरी करने वाले कर्मचारियों के लिए नहीं था। उन्होंने साफ कहा कि यह सलाह केवल उन लोगों के लिए थी जो स्टार्टअप बना रहे हैं, नई तकनीक विकसित कर रहे हैं या फिर विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी कंपनियां बनाने की महत्वाकांक्षा रखते हैं।

पाई ने कहा कि जिस तरह चीन में ‘996 कल्चर’ — सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक, हफ्ते में 6 दिन — वाले कामकाज का चलन है, नारायण मूर्ति उसी संदर्भ में बात कर रहे थे। उनका उद्देश्य सामान्य नौकरी करने वाले लाखों कर्मचारियों पर दबाव बनाना नहीं था, बल्कि उन इनोवेटर्स तक यह संदेश पहुंचाना था जो दुनिया के बड़े टेक ईकोसिस्टम से मुकाबला करना चाहते हैं।

“बयान को गलत समझा गया” — मोहनदास पाई

एक इंटरव्यू में पाई ने जोर देकर कहा कि नारायण मूर्ति का बयान केवल चुनिंदा लोगों के लिए था, न कि बैंक कर्मचारियों, ऑफिस-गोअर्स या नियमित 9-5 नौकरी करने वाले आम लोगों के लिए।

उन्होंने कहा कि दुनिया के शीर्ष टेक हब — जैसे अमेरिका का सिलिकॉन वैली और चीन — की सफलता के पीछे हाई-परफॉर्मेंस टीमों की अथक मेहनत है। इन जगहों पर स्टार्टअप फाउंडर्स और इनोवेटर्स लंबे समय तक काम करते हैं, क्योंकि वे कुछ बड़ा बनाने के जुनून से प्रेरित होते हैं।

पाई ने यह भी जोड़ा कि भारत को यदि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करनी है, तो भारतीय स्टार्टअप्स को भी उसी स्तर की मेहनत और समर्पण दिखाना होगा। उनके अनुसार, यह सलाह खास तौर पर उन्हीं उद्यमियों के लिए है जो यूनिकॉर्न या ग्लोबली स्केल्ड कंपनियां बनाना चाहते हैं।

“फाउंडर्स के लिए वर्क-लाइफ बैलेंस जैसे शब्द मौजूद नहीं”

पाई ने एक दिलचस्प बात भी कही—कि किसी भी सफल फाउंडर के लिए पारंपरिक ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ जैसी अवधारणा शायद ही मौजूद होती है।

उन्होंने कहा,
“जब कोई व्यक्ति कुछ असाधारण बनाने के जुनून में उतरता है, तब वह सामान्य ऑफिस कल्चर से अलग काम करता है। उद्यमी अपनी कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए दिन-रात मेहनत करता है और इसमें उसे संतुष्टि भी मिलती है, क्योंकि वह एक दौड़ में आगे बढ़ रहा होता है।”

उनका कहना था कि फाउंडर्स का काम स्वैच्छिक होता है। वे अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए जितना समय और मेहनत दे सकें, देते हैं। इसलिए ऐसे लोगों के लिए 70 घंटों का काम करना असामान्य नहीं होता।

996 कल्चर को कर्मचारियों पर थोपना गलत

हालांकि, पाई ने स्पष्ट किया कि चीन का ‘996’ मॉडल कर्मचारियों पर थोपना अनैतिक और गैरकानूनी है। उन्होंने कहा कि कोई भी कंपनी अपने कर्मचारियों को मजबूर नहीं कर सकती कि वे सप्ताह में 72 घंटे काम करें।

उन्होंने कहा कि उद्यमिता और नौकरी के बीच बड़ा फर्क होता है—जहां उद्यमी खुद की इच्छा और जुनून से लंबे समय तक काम करता है, वहीं कर्मचारियों के लिए कानून और श्रम अधिकार लागू होते हैं। इसलिए मूर्ति के बयान को सभी पर लागू करना पूरी तरह गलत समझ है।

नारायण मूर्ति ने कहा क्या था?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब एक इंटरव्यू में नारायण मूर्ति ने भारतीय युवाओं को सप्ताह में 72 घंटे काम करने की सलाह दी। उन्होंने उदाहरण देते हुए चीन की ‘996 वर्क कल्चर’ का जिक्र किया और कहा कि भारतीय युवा यदि दुनिया में आगे बढ़ना चाहते हैं तो उन्हें अधिक मेहनत करनी होगी।

उन्होंने बताया कि उनकी कंपनी कैटामारन के कुछ कर्मचारी चीन गए थे, जहां उन्होंने टियर 1, टियर 2 और टियर 3 शहरों में जाकर वास्तव में देखा कि वहां लोग कितनी मेहनत करते हैं। उन्होंने कहा,
“चीन में 9 बजे से 9 बजे तक, हफ्ते में 6 दिन काम करने की परंपरा है। यानी 72 घंटे।”

मूर्ति का कहना था कि भारत को विश्व पटल पर मजबूती से खड़ा होने के लिए युवाओं को अधिक अनुशासन, अधिक प्रयास और अधिक उत्पादकता की जरूरत है।

बहस क्यों हुई?

अब सवाल यह है कि यह बयान विवादित क्यों हुआ?
दरअसल, भारत में पहले से ही ओवरटाइम, लंबे घंटे और कम वेतन को लेकर कई तरह की आलोचनाएं होती रही हैं। ऐसे में 70—72 घंटे काम करने की सलाह को कई लोगों ने कर्मचारियों पर अनावश्यक बोझ डालने की कोशिश के रूप में देखा।

कई लोगों ने यह भी कहा कि काम का समय बढ़ाने के बजाय कंपनियों को उत्पादकता बढ़ानी चाहिए, बेहतर तकनीक लागू करनी चाहिए और कर्मचारियों को स्वस्थ कार्यस्थल देना चाहिए।

लेकिन पाई के अनुसार, मूर्ति का बयान इस संदर्भ में नहीं था। वह केवल उद्यमियों और नवाचार से जुड़े अत्यधिक महत्वाकांक्षी लोगों के बारे में बात कर रहे थे।

क्या भारत में भी 70 घंटे काम करना जरूरी है?

यह एक बड़ा सवाल है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सभी कर्मचारियों से इतना काम कराना व्यावहारिक नहीं है, और न ही किसी कानून के तहत इसकी अनुमति है। लेकिन स्टार्टअप जगत में, जहां लक्ष्य तेजी से आगे बढ़ना होता है, वहां टीमों का अतिरिक्त मेहनत करना आम बात है।

भारत में कई युवा ऐसे हैं जो यूनिकॉर्न बनाने का सपना रखते हैं, और उनके लिए मूर्ति और पाई की बातें प्रेरणा भी मानी जा सकती हैं।

निष्कर्ष

पूरा मामला एक बात पर आकर टिकता है—मूर्ति की सलाह सभी के लिए नहीं थी। यह केवल उन लोगों के लिए थी जो भारत को वैश्विक स्तर पर टेक्नोलॉजी में आगे ले जाना चाहते हैं, जो कुछ बड़ा बनाने का सपना रखते हैं और जो अपने लक्ष्य के लिए कठोर मेहनत करने को तैयार हैं।

मोहनदास पाई के स्पष्टीकरण के बाद यह साफ होता है कि 70 घंटे के काम का विचार नौकरीपेशा लोगों के लिए नहीं, बल्कि स्टार्टअप फाउंडर्स और इनोवेटर्स के लिए था।
बहस भले ही जारी रहे, लेकिन एक बात तय है—भारत में काम करने की संस्कृति और उत्पादकता पर यह चर्चा लंबे समय तक चलने वाली है।

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