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Delhi Smog Crisis: दिल्ली में स्मॉग संकट गहराया

Delhi Smog Crisis- दिल्ली की सर्दियां एक बार फिर जहरीली हवा के साये में शुरू हो गई हैं। राजधानी के ऊपर धुएं और धुंध की चादर फैल चुकी है, जिससे सांस लेना तक मुश्किल हो गया है। इसी बीच, रविवार को शहर के प्रतिष्ठित इंडिया गेट पर लोगों ने सरकार और प्रशासन से कदम उठाने की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने साफ कहा कि साफ हवा में सांस लेना कोई विलासिता नहीं, यह एक बुनियादी मानव अधिकार है।

सोमवार सुबह दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) कई इलाकों में 350 से लेकर 400 के पार दर्ज किया गया। 100 से कम AQI को सामान्य माना जाता है जबकि 400 के ऊपर की हवा को स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक बताया जाता है। इसलिए यह स्थिति गंभीर से भी आगे निकल चुकी है। कई इलाकों में सुबह की पहली रोशनी भी धुएं की परत को नहीं भेद पाई।

दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी मानी जा चुकी है और यह स्थिति हर साल सर्दियों की शुरुआत में दोहराई जाती है। वर्तमान आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 13 भारत में हैं और उनमें भी दिल्ली का स्तर सबसे खराब है। यह चिंता केवल पर्यावरण की नहीं, नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन पर मंडराते खतरे की है।

विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों ने पोस्टर और बैनर उठाए। कई लोगों ने पुलिस बैरिकेड्स के सामने नारे लगाए और कुछ ने सड़कों पर बैठकर ट्रैफिक रोकने की कोशिश भी की। पुलिस ने कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर बसों में बिठा दिया और भीड़ को तितर-बितर कर दिया। हालांकि विरोध का संदेश स्पष्ट था कि अब केवल बयानबाजी नहीं, ठोस समाधान चाहिए।

दिल्ली में हर साल बढ़ते प्रदूषण की एक बड़ी वजह खेतों में पराली जलाना है। हरियाणा और पंजाब के खेतों में फसल कटने के बाद बचा अवशेष जलाया जाता है और उसका धुआं हवा के साथ राजधानी की ओर बढ़ता है। ठंडी हवा और तापमान गिरने से यह धुआं जमीन की निचली परतों में फंस जाता है, जिससे घना स्मॉग बनता है। इसके अलावा शहर के वाहन, फैक्ट्रियां, निर्माण कार्य और डीज़ल जेनरेटर प्रदूषण को और गंभीर बना देते हैं।

दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार दोनों इस समस्या पर कई वर्षों से अलग-अलग तरीके अपनाने की कोशिश करते रहे हैं। निर्माण कार्यों पर रोक, कुछ समय के लिए ट्रकों को शहर में प्रवेश से रोकना, स्कूलों को बंद करना और विषम-समान (Odd-Even) ट्रैफिक योजना इनमें शामिल रहे हैं। हालांकि इन उपायों का प्रभाव अक्सर अस्थायी ही रहता है।

पिछले महीने कृत्रिम बारिश कराने की कोशिश भी की गई थी, लेकिन बादलों की स्थिति अनुकूल न होने के कारण बारिश नहीं हो सकी। विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल अस्थायी योजनाएं चलाने से स्थिति नहीं सुधरेगी। इसके लिए दीर्घकालिक नीति, मजबूत कार्यान्वयन और राज्यों के बीच समन्वय की जरूरत है।

प्रदूषण केवल असुविधा का कारण नहीं है। यह फेफड़ों, दिल और दिमाग पर गंभीर प्रभाव डालता है। छोटे बच्चे, बुजुर्ग और सांस संबंधी रोगियों के लिए यह हवा जानलेवा साबित हो सकती है। स्वास्थ्य रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली में प्रदूषण हर वर्ष हजारों लोगों की असमय मृत्यु का कारण बनता है। लोग लंबे समय तक मास्क पहनने को मजबूर हैं, लेकिन यह स्थिति सामान्य नहीं है और इसे स्वीकार्य भी नहीं कहा जा सकता।

राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे पर तेज बहस जारी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई की निंदा करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि स्वच्छ हवा हर व्यक्ति का अधिकार है और जनता की आवाज़ को दबाना गलत है। वहीं, सत्ताधारी दल बीजेपी के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा कि सरकार प्रदूषण को रोकने के लिए लगातार प्रयास कर रही है और आगे भी हर संभव कदम उठाएगी।

दिल्ली की जनता अब थक चुकी है। हर साल एक ही दृश्य, एक ही वादा और वही जोखिम। बच्चों के फेफड़े खराब हो रहे हैं, अस्पतालों में सांस और अस्थमा के मरीजों की संख्या बढ़ रही है और शहर का हर व्यक्ति अनचाहे विषाक्त वातावरण का हिस्सा बनने पर मजबूर है।

यह स्पष्ट है कि अगर अब नहीं तो कभी नहीं। केवल दंड, प्रतिबंध और चुनावी वादों से स्थिति नहीं बदलेगी। असली समाधान खेतों में स्टबल मैनेजमेंट सुधारने, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत करने और औद्योगिक उत्सर्जन पर सख्त नियंत्रण के साथ ही आएगा। यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, समाज की और हर नागरिक की भागीदारी का विषय है।

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