
अमेरिका में समलैंगिक विवाह का अधिकार आज सिर्फ एक कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की ज़िंदगी, पहचान और परिवारों के भविष्य से जुड़ा सवाल बन चुका है। साल 2015 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पूरे देश में समान–लैंगिक विवाह को संवैधानिक वैधता दी थी। इस फैसले ने LGBTQ समुदाय के लिए नई उम्मीद, सुरक्षा और सामाजिक स्वीकृति का रास्ता खोला था। उस समय यह फैसला आधुनिक और प्रगतिशील अमेरिका का प्रतीक माना गया था।
लेकिन बीते कुछ वर्षों में हालात बदलते दिख रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की संरचना में हुए बदलावों, राजनीतिक परिस्थितियों और नीतियों की दिशा ने इस अधिकार के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेष रूप से तब, जब 2022 में कोर्ट ने गर्भपात (Abortion) से जुड़ा Roe v. Wade फैसला पलट दिया था। इस फैसले ने यह संकेत दिया कि न्यायालय पुरानी और स्थापित संवैधानिक मिसालों को भी बदल सकता है। इसी दौरान जस्टिस क्लेरेंस थॉमस ने अपने अलग लिखे गए मत में यह सुझाव दिया कि अदालत को समान–लैंगिक विवाह को वैध बनाने वाले निर्णय Obergefell v. Hodges की भी पुनर्समीक्षा करनी चाहिए। इस बयान ने LGBTQ समुदाय और उनके समर्थकों में चिंता की लहर पैदा कर दी।
डर क्यों बढ़ा?
हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के प्रशासन और कुछ दक्षिणपंथी विचारधाराओं से जुड़े समूहों द्वारा LGBTQ कार्यक्रमों और फंडिंग में कटौती की कोशिशों को इन चिंताओं के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। इसके साथ ही, डेमोक्रेटिक पार्टी के कई प्रभावशाली नेता यह चेतावनी दे रहे हैं कि अमेरिका में समलैंगिक विवाह अधिकार दोबारा खतरे में पड़ सकता है।
हिलेरी क्लिंटन ने हाल ही में एक पॉडकास्ट इंटरव्यू में कहा कि उन्हें आशंका है कि सुप्रीम कोर्ट वही कर सकता है जो उसने गर्भपात अधिकारों के साथ किया। उनके अनुसार, यदि Nationwide अधिकार खत्म हो गया, तो केवल आधे या उससे भी कम राज्य ही समलैंगिक विवाह को मान्यता देंगे। इसका सीधा अर्थ है कि हजारों परिवार कानूनी और सामाजिक असुरक्षा का सामना करेंगे।
मामला कैसे कोर्ट तक पहुँचा?
यह पूरा विवाद सबसे पहले सामने आया किम डेविस नाम की एक पूर्व काउंटी क्लर्क की वजह से। 2015 में जब सुप्रीम कोर्ट ने समान–लैंगिक विवाह को वैध घोषित किया, तो किम डेविस ने धार्मिक मान्यताओं का हवाला देते हुए समलैंगिक जोड़ों को विवाह लाइसेंस जारी करने से इंकार कर दिया। अदालत ने उनके इस कदम को गैर-कानूनी करार देते हुए उन पर जुर्माना लगाया। अब किम डेविस सुप्रीम कोर्ट से इस जुर्माने को हटाने और साथ ही 2015 के फैसला यानी Obergefell v. Hodges को पलटने की मांग कर रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट फिलहाल इस बात पर विचार कर रहा है कि इस मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार किया जाए या नहीं। अगर चार न्यायाधीश इसके पक्ष में वोट करते हैं, तो सुनवाई शुरू हो सकती है। अगर नहीं, तो मामला यहीं खत्म हो जाएगा।
समुदाय में चिंता, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों में संयम
हालांकि LGBTQ समुदाय में बेचैनी और तनाव साफ दिखाई दे रहा है, मगर कई कानूनी विशेषज्ञ और अधिकार कार्यकर्ता अभी भी उम्मीद बनाए हुए हैं। उनके अनुसार, Obergefell फैसला सिर्फ एक न्यायिक निर्णय नहीं, बल्कि अब समाज की संरचना और परिवार व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है।
प्रसिद्ध वकील मैरी बोनाटो, जिन्होंने ओबर्गेफेल केस में समलैंगिक जोड़ों की ओर से पैरवी की थी, कहती हैं:
“यह समझना स्वाभाविक है कि लोग अस्थिर और चिंतित महसूस कर रहे हैं। लेकिन यह फैसला अमेरिकी समाज में गहराई से जड़ें जमा चुका है। लाखों लोग इस अधिकार पर भरोसा करके अपनी ज़िंदगी और परिवार बना चुके हैं। अदालतें आमतौर पर ऐसे फैसलों को पलटने से बचती हैं।”
अमेरिका में इस समय करीब 8.23 लाख समलैंगिक जोड़े शादीशुदा हैं और लगभग 3 लाख बच्चे ऐसे परिवारों में पले-बढ़ रहे हैं। इनके लिए यह सिर्फ कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि उनके बच्चों और घरेलू जीवन की सुरक्षा का सवाल है।
क्या आगे हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि Supreme Court इस मामले को सुनने से इनकार भी कर सकता है, क्योंकि यह पहले से स्थापित कानूनी मिसालों और सामाजिक संरचना को प्रभावित करेगा। हालांकि, अगर कोर्ट सुनवाई स्वीकार कर लेता है, तो यह मामला आने वाले वर्षों में अमेरिका की राजनीति, समाज और परिवार व्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकता है।
यह स्पष्ट है कि आने वाला समय सिर्फ एक कानूनी लड़ाई का नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्य, समानता और मानवाधिकारों को लेकर नैतिक बहस का होगा।



